गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.23.14

 पूषा राजानमाघृणिरर्पगूढं गुहा हितम्अ

विन्दच्चित्रबर्हिषम्॥१४॥

पूषाराजानम्। आणिः । अप॑ऽगूढम्। गुहा। हितम्। अविन्दत्। चित्रऽबर्हिषम्।। १४॥

पदार्थ:-(पूषा) यो जगदीश्वरः स्वाभिव्याप्त्या सर्वान् पदार्थान् पोषयति सः (राजानम्) प्राणं जीवं वा (आघृणिः) समन्ताद् घृणयो दीप्तयो यस्य सः (अपगूढम्) अपगतश्चासौ गूढश्च तम् (गुहा) गुहायामन्तरिक्षे बुद्धौ वा। अत्र सुपां सुलुग्० इति डेराकारादेशः। (हितम्) स्थापितं वा (अविन्दत्) जानाति। अत्र लडथे लङ् (चित्रबर्हिषम्) चित्रमनेकविधं बर्हिरुत्तमं कर्म क्रियते येन तम्॥१४॥ अन्वयः-यतोऽयमाघृणिः पूषा परमेश्वरो गुहाहितं चित्रबर्हिषमपगूढं राजानमविन्दत्, जानाति तस्मात् सर्वशक्तिमान् वर्त्तते।।१४॥ __

भावार्थ:-यतो जगत्स्रष्टेश्वरः प्रकाशमानं सर्वस्य पुष्टिहेतुं हृदयस्थं प्राणं जीवं चापि जानाति तस्मात् सर्वज्ञोऽस्ति।।१४॥ ___

पदार्थ:-जिससे यह (आघृणिः) पूर्ण प्रकाश वा (पूषा) जो अपनी व्याप्ति से सब पदार्थों को पुष्ट करता है, वह जगदीश्वर (गुहा) (हितम्) आकाश वा बुद्धि में यथायोग्य स्थापन किये हुए वा स्थित(चित्रबर्हिषम्) जो अनेक प्रकार के कार्य को करता (अपगूढम्) अत्यन्त गुप्त (राजानम्) प्रकाशमान प्राणवायु और जीव को (अविन्दत्) जानता है, इससे वह सर्वशक्तिमान् है।।१४।।

भावार्थ:-जिस कारण जगत् का रचने वाला ईश्वर सबको पुष्ट करने हारे हृदस्यस्थ प्राण और जीव को जानता है, इससे सबका जानने वाला है।१४॥

पुनस्तस्यैव गुणा उपदिश्यन्ते

फिर अगले मन्त्र में उस ईश्वर ही के गुणों का उपदेश किया है

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