गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.22.19

 विष्णोः कर्माणि पश्यत यो वृतानि पस्पृशे।

इन्द्रस्य॒ युज्यः सा॥१९॥

विष्णोः। कर्माणि। पश्यत। यतः। व्रतानि। पस्पशे। इन्द्रस्य। युज्यः। सखा॥ १९॥

पदार्थ:-(विष्णोः) सर्वत्र व्यापकस्य शुद्धस्य स्वाभाविकानन्तसामर्थ्यस्येश्वरस्य (कर्माणि) जगद्रचनपालनन्यायकरणप्रलयत्वादीनि (पश्यत) सम्यग्विजानीत (यतः) कर्मबोधस्य सकाशात् (व्रतानि)सत्यभाषणन्यायकरणादीनि (पस्पशे) स्पृशति कर्तुं शक्नोति। अत्र लडथै लिट। (इन्द्रस्य) जीवस्य (युज्य:) युञ्जन्ति व्याप्त्या सर्वान् पदार्थान् ते युजो दिक्कालाकाशादयस्तत्र भवः (सखा) सर्वस्य मित्र: सर्वसुखसम्पादकत्वात्।।१९।।

अन्वयः-हे मनुष्या यूयं य इन्द्रस्य युज्यः सखास्ति, यतो जीवो व्रतानि पस्पशे स्पृशति, तस्य विष्णोः कर्माणि पश्यत॥१९॥

भावार्थ:-यस्मात् सर्वमित्रेण जगदीश्वरेण जीवानां पृथिव्यादीनि ससाधनानि शरीराणि रचितानि तस्मादेवं सर्वे प्राणिनः स्वानि स्वानि कर्माणि कर्तुं शक्नुवन्तीति।।१९।___

पदार्थ:-हे मनुष्य लोगो! तुम जो (इन्द्रस्य) जीव का (युज्यः) अर्थात् जो अपनी व्याप्ति से पदार्थों में संयोग करने वाले दिशा, काल और आकाश हैं, उनमें व्यापक होके रमने वा (सखा) सर्व सुखों के सम्पादन करने से मित्र है (यतः) जिससे जीव (व्रतानि) सत्य बोलने और न्याय करने आदि उत्तम कर्मों को (पस्पशे) प्राप्त होता है उस (विष्णोः) सर्वत्र व्यापक शुद्ध और स्वभावसिद्ध अनन्त सामर्थ्य वाले परमेश्वर के (कर्माणि) जो कि जगत् की रचना पालना न्याय और प्रयत्न करना आदि कर्म हैं, उनको तुम लोग (पश्यत) अच्छे प्रकार विदित करो।।१९।

भावार्थ:-जिस कारण सब के मित्र जगदीश्वर ने पृथिवी आदि लोक तथा जीवों के साधन सहित शरीर रचे हैं। इसी से सब प्राणी अपने-अपने कार्यों के करने को समर्थ होते हैं।१९।।

तद् ब्रह्म कीदृशमित्युपदिश्यते

वह ब्रह्म कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है

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