गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.16.4

 उप॑ नः सुतमा गहि हरिभिरिन्द्र केशिभिः

सुते हि त्वा हामहे॥४॥

उप। नः। सुतम। आ। गहि। हरिऽभिः। इन्द्र। केशिभिःसुते। हि। त्वा। हामहे॥४॥

पदार्थ:-(उप) निकटार्थे (न:) अस्माकम् (सुतम्) उत्पादितम् (आ) समन्तात् (गहि) गच्छतिअत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट। बहुलं छन्दसि इति शपो लुक्। वा छन्दसि इति हेरपित्वादनुनासिकलोपश्च। (हरिभिः) हरणाहरणशीलैर्वेगवद्भिः किरणैः (इन्द्र) वायुः (केशिभिः) केशा बह्वयो रश्मयो विद्यन्ते येषामग्निविद्युत्सूर्याणां तैः सह। क्लिशेरन् लोलोपश्च। (उणा०५.३३) अनेन ‘क्लिश' धातोरन् प्रत्ययो लकारलोपश्च। ततो भूम्न्यर्थ इनिः। केशी केशा रश्मयस्तैस्तद्वान् भवति काशनाद्वा प्रकाशनाद्वा केशीदं ज्योतिरुच्यते। (निरु०१२.२५) (सुते) उत्पादिते होमशिल्पादिव्यवहारे (हि) यतः (त्वा) तम् (हवामहे) आदाः ॥४॥

अन्वयः-हि यतोऽयमिन्द्रो वायु: केशिभिर्हरिभिः सह नोऽस्माकं सुतमुपाग[पागच्छति तस्मात्त्वा तं सुते वयं हवामहे॥४॥ __

भावार्थ:-येऽस्माभिः शिल्पव्यवहारादिषूपकर्त्तव्याः पदार्थाः सन्ति, तेऽग्निविद्युत्सूर्य्या वायुनिमित्तेनैव प्रज्वलन्ति गच्छन्त्यागच्छन्ति च।४।।

पदार्थः-(हि) जिस कारण यह (इन्द्र) वायु (केशिभिः) जिनके बहुत से केश अर्थात् किरण विद्यमान हैं, वे (हरिभिः) पदार्थों के हरने वा स्वीकार करने वाले अग्नि, विद्युत् और सूर्य के साथ (न:) हमारे (सुतम्) उत्पन्न किये हुए होम वा शिल्प आदि व्यवहार के (उपागहि) निकट प्राप्त होता है, इससे (त्वा) उसको (सुते) उत्पन्न किये हुए होम वा शिल्प आदि व्यवहारों में हम लोग (हवामहे) ग्रहण करते हैं।॥४॥

भावार्थ:-जो पदार्थ हम लोगों को शिल्प आदि व्यवहारों में उपकारयुक्त करने चाहियें, वे अग्नि विद्युत् और सूर्य वायु ही के निमित्त से प्रकाशित होते तथा जाते आते हैं॥४॥

पुनरिन्द्रगुणा उपदिश्यन्ते।

फिर भी अगले मन्त्र में इन्द्र के गुणों का उपदेश किया है

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