मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.10.6

 तमित्सखित्व ईमहे तं राये तं सुवीर्योस

शुक्र उत नः शकदिन्द्रो वसु दय॑मानः॥६॥१९॥

तम्। इत्। सख़िऽत्वे। ईमहे। तम्। ग़ये। तम्। सुऽवी। सः। शुक्रः। उता नः। शकत्। इन्द्रः। वसु। दय॑मानः॥६॥

पदार्थ:-(तम्) परमेश्वरम् (इत्) एव (सखित्वे) सखीनां सुखायानुकूलं वर्तमानानां कर्मणां भावस्तस्मिन् (ईमहे) याचामहेईमह इति याञ्चाकर्मसु पठितम्। (निघं०३.१९) (तम्) परमैश्वर्यवन्तम् (राये) विद्यासुवर्णादिधनाय (तम्) अनन्तबलपराक्रमवन्तम् (सुवीर्ये) शोभनर्गुणैर्युक्तं वीर्य्य पराक्रमो यस्मिंस्तस्मिन् (स:) पूर्वोक्तः (शक्रः) दातुं समर्थः (उत) अपि (न:) अस्मभ्यम् (शकत्) शक्नोति।

अत्र लडथै लुङडभावश्च। (इन्द्रः) दुःखानां विदारयिता (वसु) सुखेषु वसन्ति येन तद्धनं विद्याऽऽरोग्यादिसुवर्णादि वा। वस्विति धननामसु पठितम्। (निघ०२.१०) (दयमानः) दातुं विद्यादिगुणान् प्रकाशितुं सततं रक्षितुं दुःखानि दोषान् शत्रूश्च सर्वथा विनाशितुं धार्मिकान् स्वभक्तानादातुं समर्थः । दय दानगतिरक्षणहिंसादानेषु इत्यस्य रूपम्॥६॥

अन्वयः-यो नो दयमानः शक्र इन्द्रः परमात्मा वसु दातुं शक्नोति तमिदेव वयं सखित्वे तं राये तं सुवीर्य्य ईमहे॥६॥

भावार्थ:-सर्वैर्मनुष्यैः सर्वशुभगुणप्राप्तये परमेश्वरो याचनीयो नेतरः, कुतस्तस्याद्वितीयस्य सर्वमित्रस्य परमैश्वर्य्यवतोऽनन्तशक्तिमत एवैतदातुं सामर्थ्यवत्त्वात्॥६॥

इत्येकोनविंशो वर्ग: समाप्तः॥

पदार्थ:-जो (न:) हमारे लिये (दयमानः) सुखपूर्वक रमण करने योग्य विद्या, आरोग्यता और सुवर्णादि धन का देनेवाला, विद्यादि गुणों का प्रकाशक और निरन्तर रक्षक तथा दुःख दोष वा शत्रुओं के विनाश और अपने धार्मिक सज्जन भक्तों के ग्रहण करने (शक्रः) अनन्त सामर्थ्ययुक्त (इन्द्रः) दुःखों का विनाश करनेवाला जगदीश्वर है, वही (वसु) विद्या और चक्रवर्त्ति राज्यादि परमधन देने को (शकत्) समर्थ है, (तमित्) उसी को हम लोग (उत) वेदादि शास्त्र सब विद्वान् प्रत्यक्षादि प्रमाण और अपने भी निश्चय से (सखित्वे) मित्रों और अच्छे कर्मों के होने के निमित्त (तम्) उसको (राये) पूर्वोक्त विद्यादि धन के अर्थ और (तम्) उसी को (सुवीर्ये) श्रेष्ठ गुणों से युक्त उत्तम पराक्रम की प्राप्ति के लिये (ईमहे) याचते हैं॥६॥ ___

भावार्थ:-सब मनुष्यों को उचित है कि सब सुख और शुभगुणों की प्राप्ति के लिये परमेश्वर ही की प्रार्थना करें, क्योंकि वह अद्वितीय सर्वमित्र परम्मैश्वर्यवाला अनन्त शक्तिमान् ही का उक्त पदार्थों के देने में सामर्थ्य है॥६॥

यह उन्नीसवां वर्ग समाप्त हुआ।

अथेन्द्रशब्देनेश्वरसूर्य्यलोकावुपदिश्यते।

अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से ईश्वर और सूर्य्यलोक का प्रकाश किया है

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