शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

ऋग्वेद 1.1.2

 सोऽग्नि: कैः स्तोतव्योऽन्वेष्टव्यगुणो वास्तीत्युपदिश्यते।

उक्त अग्नि किन के स्तुति करने वा खोजने योग्य है, इसका उपदेश अगले मन्त्र में किया है

अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैत।

स दे॒वाँ एह वक्षति॥२॥

अग्निःपूर्वेभिः। ऋषिभिः। ईड्यः। नूतनैः। उत। सः। देवान्। आ। इह। वक्षति॥२॥ पदार्थ:-(अग्निः) ऋषिषूत्क्रामत्सु देवानब्रुवन्को न ऋषिर्भविष्यतीति। तेभ्य (निरु०१३.१२) अत्र तर्क एव ऋषिरुक्तःअविज्ञाततत्त्वेऽर्थे (न्याय०१.१.४०) या तत्त्वज्ञानार्थोहा सैव तर्कशब्देन अत्रर्षिशब्देन प्राणा गृह्यन्ते। (ईड्यः) वेदार्थाध्यतृभिर्ब्रह्मचारिभिस्तः कार्यस्थैर्विद्यमानैः दिव्यानीन्द्रियाणि विद्यादिदिव्यगुणान् दिव्यान् (निरु०१३.१२) अत्र तर्क एव ऋषिरुक्तःअविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः(न्याय०१.१.४०) या तत्त्वज्ञानार्थोहा सैव तर्कशब्देन गृह्यते। प्राणा ऋषयः। (श०ब्रा०७.२.१.५) अत्रर्षिशब्देन प्राणा गृह्यन्ते। (ईड्यः) नित्यं स्तोतव्योऽन्वेष्टव्यश्च (नूतनैः) वेदार्थाध्यतृभिर्ब्रह्मचारिभिस्तः कार्यस्थैर्विद्यमानैः प्राणैर्वा (उत) अप्येव (स:) पूर्वोक्तः (देवान्) दिव्यानीन्द्रियाणि विद्यादिदिव्यगुणान् दिव्यान् ऋतून् दिव्यान् भोगान्वा। ऋतवो वै देवाः)

परमेश्वरो भौतिको वा (पूर्वेभिः) अधीतविद्यैर्वर्त्तमानैः प्राक्तनैर्वा विद्वद्भिः (ऋषिभिः) मन्त्रार्थद्रष्टुभिरध्यापकैस्तर्के: कारणस्थैः प्राणैर्वा-ऋषिप्रशंसा चैवमुच्चावचैरभिप्रायैर्ऋषीणां मन्त्रदृष्टयो भवन्ति। (निरु०७.३) इयमेव ऋषीणां प्रशंसा यतस्त एवमुच्चावचैर्महदल्पाभिप्रायैर्मन्त्रार्थेविदितैः प्रशंसनीया भवन्ति, तेषामृषीणां मन्त्रेषु दृष्टयोऽर्थादत्यन्तपुरुषार्थेन मन्त्रार्थानां यथावदर्शनानि ज्ञानानि भवन्ति तस्मात्ते पूज्याः सत्कर्त्तव्या आसन्निति। साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो बूभूवुस्तेऽवरेभ्योऽसाक्षात्कृतधर्मभ्य उपदेशेन मन्त्रान्त्सम्प्रादुरुपदेशाय ग्लायन्तोऽवरे बिल्मग्रहणायेमं ग्रथं समाम्मासिषुर्वेदं च वेदाङ्गानि च बिल्मं भिल्मं भासनमिति वा(निरु०१.२०) कीदृशा ऋषयो भवन्तीत्यात्राह-यतः साक्षात्कृतधर्माणो धार्मिका आप्ता यैः सर्वा विद्या यथावद्विदिता, येऽवरेभ्यो ह्यसाक्षात्कृतवेदेभ्यो मनुष्येभ्य उपदेशेन वेदमन्त्रान् मन्त्रार्थांश्च सम्प्रादुः प्रकाशितवन्तस्तस्मात्ते ऋषयो जाताः। तैः कस्मै प्रयोजनाय मन्त्राध्यापनं तदर्थप्रकाशश्च कृत इत्यत्रोच्यतेउत्तरोत्तरं वेदार्थप्रचाराय। येऽवरेऽल्पबुद्धयो मनुष्या अध्ययनायोपदेशाय च ग्लायन्ते तेषां वेदार्थविज्ञानायेमं नघण्टुकं निरुक्ताख्यं च ग्रन्थं समाम्नासिषुः सम्यगभ्यासार्थ रचितवन्तःयेन सर्वे मनुष्या वेदं वेदाङ्गानि च यथार्थतया विजानीयुरेवं कृपालव ऋषयो गण्यन्त इति। पुरस्तान्मनुष्या वा ऋषिषूत्क्रामत्सु देवानब्रुवन्को न ऋषिर्भविष्यतीति। तेभ्य एतं तर्कमृर्षि प्रायच्छन् मत्रार्थचिन्ताभ्यूहमभ्यूढम्।

(श० ब्रा०७.२.२.२६) अनेनर्तुशब्देन दिव्यगुणविशिष्टा भोगा गृह्यन्ते। (आ) समन्तात् (इह) अस्मिन् वर्तमाने संसारे जन्मनि वा (वक्षति) वहतु प्रापयतु॥२॥

यास्कमुनिरिमं मन्त्रमेवं समाचष्टे-अग्नियः पूर्वैर्ऋषिभिरीडितव्यो वन्दितव्योऽस्माभिश्च नवतरैः स देवानिहावहत्विति। स न मन्येतायमेवाग्निरित्यप्येते उत्तरे ज्योतिषी अग्नी उच्यते। (निरु०७.१६.२)॥२॥ अन्वयः-योऽयमग्निः पूर्वेभिरुत नूतनैऋषिभिरीड्योऽस्ति, स एह देवान् वक्षति समन्तात्प्रापयतु॥२॥ ___

भावार्थ:-ये सर्वा विद्याः पठित्वा सत्योपदेशेन सर्वोपकारका अध्यापका वर्तन्ते पूर्वभूताश्च ते पूर्व इति शब्देन ये चाध्येतारो विद्याग्रहणायाभ्यासं कुर्वन्ति ते नूतनैरिति पदेन गृह्यन्ते। ये मन्त्रार्थान् विदितवन्तो धर्मविद्ययोः प्रचारस्यैवानुष्ठातारः सत्योपदेशेन सर्वाननुग्रहीतारो निश्छलाः पुरुषार्थिनो मोक्षधर्मसिध्यर्थमीश्वरस्यैवोपासकाः कामार्थसिध्यर्थं भौतिकाग्नेर्गुणज्ञानेन कार्यसिद्धिं सम्पादयन्तो मनुष्यास्ते ऋषिशब्देन गृह्यन्ते। पूर्वेषां नूतनानां च ये युक्तिप्रमाणसिद्धास्तत्त्वज्ञानार्थास्ताः , ये च जगत्कारणस्थाः कार्य्यजगत्स्थाश्च प्राणाः सन्ति तैः सह योगाभ्यासेनेश्वरो भौतिकश्चाग्निर्वन्द्योऽध्यन्वेष्टव्यगुणश्चास्ति। सर्वज्ञेनेश्वरेण स्वकीयज्ञानान्मनुष्यज्ञानापेक्षयाऽतीतान् वर्तमानांश्चर्षीन् विदित्वाऽस्मिन् मन्त्र उपदिष्टे सति नैव कश्चिद्दोषो भवितुमर्हति, वेदस्य सर्वज्ञवाक्यत्वात्। सोऽयमेवमुपासितो व्यवहारकार्येषु संयोजितः सन् सर्वोत्तमान् गुणान् भोगांश्च प्रापयति। अत्र प्राचीनापेक्षया नवीनत्वं नवीनापेक्षया प्राचीनत्वं च विज्ञायत इतिअयमेवार्थो निरुक्तकारेणोक्तः-यस्तु खलु प्राकृतजनैः पाककरणादिषु प्रसिद्धः प्रयोज्यते सोऽस्मिन् मन्त्रे नैव ग्राह्यः, किन्तु सर्वप्रकाशकः परमेश्वरः सर्वविद्याहेतुविद्युदाख्योऽर्थश्चाऽग्निशब्देनात्रोच्यत इति। .एतन्मन्त्रार्थः सायणाचार्यादिभिरन्यथोक्तः। तद्यथा-पुरातनै ग्वङ्गिरःप्रभृतिभि नूतनैरुतेदानींतनैरस्माभिरपि स्तुत्यःदेवान् हविर्भुज आवक्षतीत्यन्यथेदं व्याख्यानमस्ति। तद्वद्यूरोपखण्डस्थैरत्रस्थैश्च कृतमिंगलैण्डभाषायं वेदार्थयत्नादिषु च व्याख्यानमप्यसमञ्जसम्। कुतः ईश्वरोक्तस्यानादिभूतस्य वेदस्येदृशं व्याख्यानं क्षुद्राशयं निरुक्तशतपथादिग्रन्थविरुद्धं चास्त्यत इति॥२॥ पदार्थान्वयभाषा:-(पूर्वेभिः) वर्तमान वा पहिले समय के विद्वान् (नूतनैः) वेदार्थ के पढ़नेवाला ब्रह्मचारी तथा नवीन तर्क और कार्यों में ठहरनेवाले प्राण (ऋषिभिः) मन्त्रों के अर्थों को देखनेवाले विद्वान्, उन लोगों के तर्क और कारणों में रहनेवाले प्राण, इन सभों को (अग्निः ) वह परमेश्वर (ईड्यः ) स्तुति करने योग्य और यह भौतिक अग्नि नित्य खोजने योग्य है।

प्राचीन और नवीन ऋषियों में प्रमाण ये हैं कि--(ऋषिप्रशंसा०) वे ऋषि लोग गूढ़ और अल्प अभिप्राययुक्त मन्त्रों के अर्थों को यथावत् जानने से प्रशंसा के योग्य होते हैं, और उन्हीं ऋषियों की मन्त्रों में दृष्टि अर्थात् उनके अर्थों के विचार में पुरुषार्थ से यथार्थ ज्ञान और विज्ञान की प्रवृत्ति होती है, इसी से वे सत्कार करने योग्य भी हैं। तथा (साक्षात्कृत०) जो धर्म और अधर्म की ठीक-ठीक परीक्षा करने वाले धर्मात्मा और यथार्थवक्ता थे, तथा जिन्होंने सब विद्या यथावत् जान ली थी, वे ही ऋषि हुए और जिन्होंने मन्त्रों के अर्थ ठीक-ठीक नहीं जाने थे और नहीं जान सकते थे, उन लोगों को अपने उपदेश द्वारा वेदमन्त्रों का अर्थ सहित ज्ञान कराते हुए चले आये, इस प्रयोजन के लिये कि जिससे उत्तरोत्तर अर्थात् पीढ़ी दर पीढ़ी आगे को भी वेदार्थ का प्रचार उन्नति के साथ बना रहे, तथा जिससे कोईमनुष्य अपने और उक्त ऋषियों के लिये हुए व्याख्यान सुनने के लिये अपने निर्बुद्धिपन से ग्लानि को प्राप्त हो, इस बात के सहाय में उनको सुगमता से वेदार्थ का ज्ञान होने के लिये उन ऋषियों ने निघण्टु और निरुक्त आदि ग्रन्थों का उपदेश किया है, जिससे कि सब मनुष्यों को वेद और वेदाङ्गों का यथार्थ बोध हो जावे। (पुरस्तान्मनुष्या०) इस प्रमाण से ऋषि शब्द का अर्थ तर्क ही सिद्ध होता है(अविज्ञात०) यह न्यायशास्त्र में गोतम मुनिजी ने तर्क का लक्षण कहा है, इससे यही सिद्ध होता है कि जो सिद्धान्त के जानने के लिये विचार किया जाता है उसी का नाम तर्क है(प्राणा०) इन शतपथ के प्रमाणों से ऋषि शब्द करके प्राण और देव शब्द करके ऋतुओं का ग्रहण होता है(स: उत) वही परमेश्वर (इह) इस संसार वा इस जन्म में (देवान्) अच्छी-अच्छी इन्द्रियां, विद्या आदि गुण, भौतिक अग्नि और अच्छे-अच्छे भोगने योग्य पदार्थों को (आवक्षति) प्राप्त करता है

(अग्निः पूर्वे०) इस मन्त्र का अर्थ निरुक्तकार ने जैसा कुछ किया है, सो इस मन्त्र के भाष्य में लिख दिया है॥२॥

भावार्थ:-जो मनुष्य सब विद्याओं को पढ़के औरों को पढ़ाते हैं तथा अपने उपदेश से सब का उपकार करनेवाले हैं वा हुए हैं वे पूर्व शब्द से, और जो कि अब पढ़नेवाले विद्या ग्रहण के लिये अभ्यास करते हैं, वे नूतन शब्द से ग्रहण किये जाते हैं। और वे सब पूर्ण विद्वान् शुभ गुण सहित होने पर ऋषि कहाते हैं, क्योंकि जो मन्त्रों के अर्थों को जाने हुए धर्म और विद्या के प्रचार, अपने सत्य उपदेश से सब पर कृपा करनेवाले निष्कपट पुरुषार्थी धर्म के सिद्ध होने के लिये ईश्वर की उपासना करनेवाले और कार्यों की सिद्धि के लिये भौतिक अग्नि के गुणों को जानकर अपने कर्मों के सिद्ध करनेवाले होते हैं, तथा प्राचीन और नवीन विद्वानों के तत्त्व जानने के लिये युक्ति प्रमाणों से सिद्ध तर्क और कारण वा कार्य जगत् में रहनेवाले जो प्राण हैं, इन सब से ईश्वर और भौतिक अग्नि का अपनेअपने गुणों के साथ खोज करना योग्य है। और जो सर्वज्ञ परमेश्वर ने पूर्व और वर त्रिकालस्थ ऋषियों को अपने सर्वज्ञपन से जान के इस मन्त्र में परमार्थ और व्यवहार ये दो विद्या दिखलाई हैं, इससे इसमें भूत वा भविष्य काल की बातों के कहने में कोई भी दोष नहीं आ सकता, क्योंकि वेद सर्वज्ञ परमेश्वर का वचन है। वह परमेश्वर उत्तम गुणों को तथा भौतिक अग्नि व्यवहार कार्यों में संयुक्त किया हुआ उत्तम-उत्तम भोग के पदार्थों का देनेवाला होता है। पुराने की अपेक्षा एक पदार्थ से दूसरा नवीन और नवीन की अपेक्षा पहिला पुराना होता है।

देखो, यही अर्थ इस मन्त्र का निरुक्तकार ने भी किया है कि-प्राकृत जन अर्थात् अज्ञानी लोगों ने जो प्रसिद्ध भौतिक अग्नि पाक बनाने आदि कार्यों में लिया है, वह इस मन्त्र में नहीं लेना, किन्तु सब का प्रकाश करनेहारा परमेश्वर और सब विद्याओं का हेतु जिसका नाम विद्युत् है, वही भौतिक अग्नि यहां अग्नि शब्द से लिया है। _

_ (अग्निः पूर्वे०) इस मन्त्र का अर्थ नवीन भाष्यकारों ने कुछ का कुछ ही कर दिया है, जैसे सायणाचार्य ने लिखा है कि-(पुरातनैः०) प्राचीन भृगु, अङ्गिरा आदियों और नवीन अर्थात् हम लोगों को अग्नि की स्तुति करना उचित है। वह देवों को हवि अर्थात् होम में चढ़े हए पदार्थ उनके खाने के लिये पहुंचाता है। ऐसा ही व्याख्यान यूरोप खण्डवासी और आर्यावर्त्त के नवीन लोगों ने अगरेजी भाषा में किया है, तथा कल्पित ग्रन्थों में अब भी होता हैसो यह बड़े आश्चर्य की बात है जो ईश्वर के प्रकाशित अनादि वेद का ऐसा व्याख्यान जिसका क्षुद्र आशय और निरुक्त शतपथ आदि सत्य ग्रन्थों से विरुद्ध वह सत्य कैसे हो सकता है।।२॥

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