ऋग्वेद 1.3.9

 विश्वे देवासौ अस्रिध एहिमायासो अद्रुहः

मेधं जुषन्त वह्नयः॥९॥

विश्व। दे॒वासःअनिधः। एहि मायासः। अदुहःमेधम्। जुषन्त। वह्नयः॥९॥

पदार्थ:-(विश्वे) समस्ताः (देवासः) वेदपारगाः (अस्रिधः) अक्षयविज्ञानवन्तः। क्षयार्थस्य नपूर्वकस्य सिधेः क्विबन्तस्य रूपम्। (एहिमायास:) आसमन्ताच्चेष्टायां प्रज्ञा येषां ते। चेष्टार्थस्याङ्यूर्वस्य ईहधातोः सर्वधातुभ्य इन्। (उणा०४.११९) इतीन्प्रत्ययान्तं रूपम्। मायेति प्रज्ञानामसु पठितम्। (निघं०३.९) (अद्रुहः) द्रोहरहिताः (मेधम्) ज्ञानक्रियामयं शुद्धं यज्ञं सर्वविद्वद्भिः शुभैर्गुणैः कर्मभिर्वा सह सङ्गमम्। मेध इति यज्ञनामसु पठितम्। (निघं०३.१७) (जुषन्त) प्रीत्या सेवध्वम्। (वह्नयः) सुखस्य वोढारः। अयं वहेर्निप्रत्ययान्तः प्रयोगः वह्नयो वोढारः। (निरु०८.३)॥९॥ अन्वयः-हे एहिमायासोऽनिधोऽहो वह्नयो विश्वेदेवासो भवन्तो ज्ञानक्रियाभ्यां मेधं सेधनीयं यज्ञं जुषन्त॥९॥भावार्थ:-ईश्वर आज्ञापयति-भो विद्वांसः ! परक्षयद्रोहरहिता विशालविद्यया क्रियावन्तो भूत्वा सर्वेभ्यो मनुष्येभ्यो विद्यासुखयोः सदा दातारो भवन्त्विति।।९।

पदार्थ:-(एहिमायासः) हे क्रिया में बुद्धि रखनेवाले (अस्रिधः) दृढ़ ज्ञान से परिपूर्ण (अद्रुहः) द्रोहरहित (वह्नयः) संसार को सुख पहुँचानेवाले (विश्वे) सब (देवासः) विद्वान् लोगो! तुम (मेधम्) ज्ञान और क्रिया से सिद्ध करने योग्य यज्ञ को प्रीतिपूर्वक यथावत् सेवन किया करो॥९॥

भावार्थ:-ईश्वर आज्ञा देता है कि-हे विद्वान् लोगो! तुम दूसरे के विनाश और द्रोह से रहित तथा अच्छी विद्या से क्रियावाले होकर सब मनुष्यों को सदा विद्या से सुख देते रहो॥९॥ ___

तैः कीदृशी वाक् प्राप्तमेष्टव्येत्युपदिश्यते।

विद्वानों को किस प्रकार की वाणी की इच्छा करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में ईश्वर ने  कहा है

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