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एक मुखी रुद्राक्ष को धारण करने के लाभ व बारह राशियों का फल

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एक मुख वाले रुद्राक्षको ही एकमुखी रुद्राक्ष कहा जाता है.  इसे सोमवार के दिन प्रात: काल यथाविधि पूजन आदि करकेही धारण करना चाहिए, इससे पूर्व शिव का ध्यान करते हुए मन्त्र जाप करना चाहिए.       विशेष रूप से ऊँ एं हं औं ऐं ऊँ  इस  मन्त्र का १०८ बार जाप करके धारण से शीघ्र मनोकामना सिद्ध होती है.  बस आपको इतनी सावधानी रखनी होगी कि कभी भी एक मुखी रुद्राक्ष में बीच में छेद करके नही धारण करना चाहिये,अन्यथा उसकी आन्तरिक दिव्य शक्तियों का विनाश हो जाता है,और वह रुद्राक्ष अच्छे फ़ल की जगह विपरीत फ़ल देना शुरु कर देता है. इसे स्वर्ण अथवा चांदी धातु से मंडित करवाकर ही धारण करना चाहिये.   शराब मांस के सेवन तथा स्त्री पुरुष के बीच काम क्रीडा के समय पूजा स्थान में रख देना चाहिये. पुनः धारण- एक बार उतारने के बाद तीन दिन के अंतराल में पुनः धारण किये जाने से पहले  शुद्ध होकर ही धारण करना चाहिये और प्रातः काल ही उपरोक्त मंत्र का जाप जरूर करना चाहिये.   शुद्धि- धारण किये हुए रुद्राक्ष की समय-समय पर सनातन पर्वों पर तथा ग्रहण के दिन इसे गंगाजल से या किसी कुँए व किसी नदी के शुद्ध जल से धोकर साफ़ कर लेना चाहिये

दरद भारतीय आर्यों का महाभारत में प्रमाण 

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      पाणिनि की अष्टाध्यायी में दरद का वर्णन हुआ है, जिसमें उसकी भौगालिक स्थिति स्पष्ट रूप से लिखी गई है.        वासुदेव शरण अग्रवाल द्वारा रचित पाणिनि कालीन भारत में आया है कि सिन्धु नदी कैलाश पर्वत के पश्चिमी तट के अंतिम छोर से निकल कर काश्मीर को दो भागों में बांटती हैं. यह गिलगित चिलास होते हुए दरद के मैदान में उतरती है. इसलिए सिन्धु को दारदी सिन्धु भी कहा जाता है.     तिब्बत में कैलाश पर्वत श्रंखला के पश्चिमी भाग में बोखार-चू नामक ग्लेशियर जो समुद्र तल से 4164 मीटर की ऊँचाई पर है,  सिन्धु नदी उसी ग्लेशियर से निकलती है.  तिब्बत में सिन्धु नदी को 'सिंघी खमबं' अर्थात्  'शेर का मुंह' कहते हैं. लद्दाख और जास्कर सीमा के बीच उत्तर-पश्चिम दिशा में बहने के बाद यह लद्दाख और बाल्टिस्तान के माध्यम से गुजरती है. यह लद्दाख सीमा को पार करते हुए जम्मू-कश्मीर में गिलगित के पास दार्दिस्तान क्षेत्र से गुजरती है. जो भारतीय काश्मीर क्षेत्र और उत्तर पूर्व अफगानिस्तान से जुड़ा हुआ है, एक हिस्सा आज भी पाकिस्तान के कब्जे में हैं.      अरुण कुमार द्वारा रचित पुस्तक ग्रियर्सन- भाषा और साहित्