1967 में भारतीय सेना ने चीन को दिया था करारा जवाब-एक नहीं दो बार हराया था चीन को

When Indian Army Defeated Chinese Badly in 1967, The Heroic Story ...
1967 की लड़ाई की वजह क्या थी


    चीनी सैनिकों ने 13 अगस्त, 1967 को नाथू ला में भारतीय सीमा से सटे इलाके में गड्ढे खोदने शुरू कर दिए थे. जब भारतीय सैनिकों ने देखा कि कुछ गड्ढे सिक्किम के अंदर खोदे जाने लगे तो उन्होंने चीनी लोकल कमांडर से अपने सैनिकों को पीछे ले जाने को कहा. इसके बाद भारतीय सेना ने तय किया कि नाथू ला में बाउंड्री स्‍पष्‍ट करने के मकसद से कंटीलें तार लगाए जाएं. यह जिम्मा 70 फील्ड कंपनी ऑफ इंजीनियर्स एवं 18 राजपूत की एक टुकड़ी को सौंपा गया.


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    18 अगस्‍त को सीमा पर तार लगाने का काम शुरू हुआ.  इसके दो दिन बाद भड़के चीनी हथियार लेकर उन भारतीय जवानों के आगे खड़े हो गए जो तार लगा रहे थे. भारतीय सैनिक साहस के साथ डटे रहे. 


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    6 व 11 सितंबर 1967 को चीन की पीपुल्‍स लिब्रेशन आर्मी के सैनिकों ने नाथू ला में भारतीय सेना की पोस्‍ट्स पर हमला कर दिया था. 15 सितंबर 1967 को युद्ध विराम हुआ. जिसमें चीन के 100 से ऊपर की संख्या में सैनिक मारे गए. 


   उसके बाद, 1 अक्टूबर 1967 को नाथू ला से उत्तर की तरफ कुछ किमी दूर चो ला में चीनियों ने फिर घुसपैठ करने की कोशिश की. इसका कारण यह था कि चीनी सैनिक सिक्किम पर कब्ज़ा करना चाहते थे. जिसके जवाब में भारतीय सैनिकों ने आक्रामक रुख अपनाया और 200 से ऊपर चीनी सैनिकों को मारा. और चीन के दंभ को चकनाचूर कर दिया. 


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      एक आंकड़े के अनुसार  65 भारतीय सैनिक बलिदान हुए हो गए जबकि 163 सैनिक जख्मी हो गए थे.  उधर, चीनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के करीब 350 सैनिक मारे गए और 450 सैनिक घायल हो गए.


 


  साथ ही, भारतीय सैनिकों ने नाथू ला में चीनी सैनिकों के कई अस्थाई कैंप भी नष्ट कर दिए थे. भारतीय सेना ने अपने ऊपर चीन के मनोवैज्ञानिक दबाव को समाप्त कर दिया. किन्तु वर्तमान में लद्दाख में भारतीय सीमा गलवान घाटी में हुए चीनी हमलों में भी 20 भारतीय जवानों ने अपने बलिदान से पूर्व चीनी सेना को भी काफी क्षति पहुंचाईं है. किन्तु भारत की सीमाओं की सुरक्षा की दृष्टि से भारतीय सेना को चीनी सेना की बड़ी क्षति के परिणाम को शीघ्र लाना होगा. 


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    कहा जाता है कि चीन के साथ 1967 की इस लड़ाई में राजपूताना रेजीमेंट के मेजर जोशी, कर्नल राय सिंह, मेजर हरभजन सिंह, गोरखा रेजीमेंट के कृष्ण बहादुर, देवी प्रसाद ने यादगार पराक्रम का प्रदर्शन किया था. इन सभी वीर अफसरों और जवानों के बारे में बताया जाता है कि जब लड़ाई के दौरान गोलियां खत्‍म हो गईं तो इन सभी ने अपनी खुखरी से कई चीनी अफसरों और जवानों को यमलोक पहुंचाया. 


  भारत पुनः ऐसे शौर्य प्रदर्शन के इतिहास को दोहराने में सक्षम है ! गलवान घाटी के वीर बलिदानियों को नमन !


चीन के सरकारी मीडिया ने कभी भी पाँच साल बाद 1967 में नाथु ला में हुई उस घटना का ज़िक्र नहीं किया है जिसमें उसके 300 से अधिक सैनिक मारे गए थे जबकि भारत को सिर्फ़ 65 सैनिकों का नुक़सान उठाना पड़ा था. सुनिए उसी अनसुने युद्ध की कहानी BBC द्वारा यह रिपोर्ट



 


 


    


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