तीन सौ रूपये की पिस्तौल, जिससे गोडसे ने गाँधी का वध किया

नई दिल्ली | हिन्दू महासभा, ग्वालियर के नेता डॉ दत्तात्रेय सदाशिव परचुरे ने बरेटा M1934 मॉडल की पिस्तौल पंडित नाथूराम गोडसे को उपलब्ध कराई थी, डॉ दत्तात्रेय सदाशिव परचुरे पेशे से चिकित्सक कार्य करते हुए देश की स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन में भाग लेते थे | १९३९ में हिन्दू महासभा के एक कार्यक्रम में वीर सावरकर से भेंट करने के बाद हिन्दूओं को मिलिट्री ट्रेनिंग देने के लिए हिन्दू राष्ट्र सेना का  गठन किया | नाथूराम   गोडसे से भेंट होने के बाद दोनों में गहरी दोस्ती  हो गई | डॉ परचुरे अंग्रेजों के साथ-साथ मुस्लिम लीग के गुंडों से भी लड़ने के कारण ग्वालिअर में कट्टर हिन्दू  नेता के रूप में   विख्यात थे | 


   


    देश विभाजन के षड्यंत्र के मुख्य आरोपी मोहन दास गाँधी के वध के लिए २० जनवरी १९४८ के बम्ब विस्फोट के विफल प्रयास के बाद पं नाथूराम गोडसे ने डॉ परचुरे से सहयोग माँगा, सलाह यह हुई कि गांधी को गोली से निपटाए जाए | इसके लिए एक छोटी पिस्तौल का उपयोग हो, जिसे आसानी से प्रार्थना सभा तक लाया जा सके |


    डॉ परचुरे ने पिस्तौल के लिए खोजबीन प्रारम्भ की | इनके एक मित्र गंगाधर दंडवते ने एक इटालियन पिस्तौल बरेटा M1934 संख्या -  606824, खोज ली, जो लम्बाई में मात्र छः इंच थी | और अपने घर पर बुलाकर पिस्तौल के स्वामी जगदीश गोयल से कुल तीन सौ रूपये में खरीदकर गोडसे को दे दी | इसी पिस्तौल से गोडसे ने गाँधी को यमलोक पहुंचा कर देश विभाजन में २१ लाख लोगों की हत्याओं का प्रतिशोध लिया | 


बरेटा M1934 पिस्तौल का इतिहास



     इटली की रॉयल आर्मी का यह हथियार द्वितीय इटालियन-इथोपिया युद्ध (१९३५-१९३७) में बहुत प्रयोग हुआ | इटली के साथ जर्मनी और रोमानिया ने भी इसका प्रयोग किया | युद्ध के दौरान इस पिस्तौल की अधिकाँश खेप यूनाइटेड नेशन के अलाइड फ़ोर्स के कब्जे में चली गई थी | 


 


    ग्वालियर महाराज महाराजा जीवाजी राव सिंधिया की ग्वालियर सेना ब्रिटिश हुकुमत के लिए द्वितीय इटालियन-इथोपिया युद्ध जिसे इतालियन-अबेसियानिया (ईस्ट अफ्रीका ) में भाग ले रही थी, तब एक मोर्चे पर मुसोलिनी ने ब्रिटिश टुकड़ी के समक्ष समर्पण कर दिया | सेना की कमान संभाल रहे एक ब्रिटिश अधिकारी को यह युद्ध में बहादुरी के ईनाम में यह पिस्तौल मिली, जिसे बाद में ग्वालियर के ही एक सैन्य अधिकारी वी बी जोशी ने १९३४ में बने इस इटालियन बरेटा पिस्तौल को उस ब्रिटिश अफसर से खरीद लिया था | इसके बाद ग्वालियर निवासी जगदीश गोयल ने इसे उनके परिवार के एक सदस्य से खरीद लिया था | 


 इसी पिस्तौल को गोडसे ने लेकर डॉ परचुरे के घर के पिछवाड़े में अभ्यास किया | हालांकि गोडसे को फुल आटोमेटिक पिस्तौल चाहिए थी, किन्तु इस सेमी आटोमेटिक बरेटा पिस्तौल के निशाने से वे सन्तुष्ट हो गए | दो दिन रुके वे इस पिस्तौल के साथ २८ जनवरी को दादर-अमृतसर-पठानकोट एक्सप्रेस ट्रेन में बैठकर दिल्ली आ गए | फिर कनाट प्लेस के मरीना होटल में ठहर गए |


    ३० जनवरी को बिरला हाउस में इस पिस्तौल से एक सेकंड के आधे हिस्से से भी कम समय में तीन गोलियों से गांधी को सीधे यमलोक पहुंचा दिया | 


सबसे ज्यादा बिकने वाली लघु पिस्तौल बनी बरेटा M1934



      गाँधी वध में प्रयोग हुए इस इटालियन पिस्तौल ने विश्व भर में ख्याति पाई | सबसे पहले १९३४ में इसका निर्माण हुआ था | कम्पनी ने १९९१ तक इसका निर्माण किया | अब तक बरेटा M1934 पिस्तौल दस लाख अस्सी हजार का उत्पादन हो चूका है | जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है, जिसका श्रेय केवल पंडित नाथूराम गोडसे को जाता है |



 


 


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