शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

मृगशिरा नक्षत्र का ज्योतिषीय उपाय -खादिर,अनेक अनसुने फायदे

Image result for khair treeनई दिल्ली : हिन्दू ज्योतिष के अनुसार 27 नक्षत्रों के स्वामित्व वाले वृक्ष व वनस्पतियां हैं | वृषभ व मिथुन राशि के संधि में मृगशिरा नक्षत्र स्थित है, वृषभ 23 अंश 20 कला से प्रारम्भ होकर अगली राशि मिथुन के 6 अंश 40 कला तक इसका प्रभुत्व है | प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं, इसके दो चरण वृषभ व दो चरण मिथुन राशि में है | इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह मंगल देव हैं और देवत्व सोमदेव को प्राप्त है |


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    मृगशिरा नक्षत्र का प्रतिनिधि खैर यानी खादिर वृक्ष है | जिनकी जन्मकुंडली में यह नक्षत्र पाप ग्रहों से पीड़ित है या यह नक्षत्र तारा चक्र में विपत, प्रत्यहरि व वध वर्ग में है तो उपाय के रूप में खैर के पौधों का दान रूप में रोपण करना चाहिए, वृक्षारोपण विशेष रूप से तभी करना चाहिए जब चंद्रमा इसी नक्षत्र पर गोचर कर रहा हो अथवा महादशा या अन्तर्दशा या प्रत्यंतरनाथ ग्रह का गोचर इसी नक्षत्र में हो रहा हो |  यह ध्यान रखना चाहिए कि गोचरस्थ ग्रह पर अशुभ ग्रह की दृष्टि ना हो, यदि हो तो उस अशुभ ग्रह का ज्योतिषीय उपचार अवश्य करना चाहिए, जिससे नक्षत्र उपचार के शुभ फल प्राप्त हो सके | 




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    खैर (खादिर) का परिचय 


    आप पान खाते हैं अगर आप पान खाते हैं तो पान में लगाए जाने वाले कत्था के बारे में जरूर जानते होंगे |  खैर की शाखाओं तथा छाल को उबालकर ही कत्था निकाला जाता है। इतना ही नहीं खैर या खादिर का प्रयोग धार्मिक कार्यों में भी किया जाता है। इसके अलावा खादिर या खैर का उपयोग औषधि रूप में किया जाता है |


     नव ग्रह समिधा में खादिर या खैर की लकड़ी का उपयोग विशेष रूप से मंगल ग्रह की समिधा के रूप में हवन में प्रयोग किया जाता है |  खैर का पेड़ बहुत ही मजबूत होते हैं, इसका तना हड्डियों की तरह कठोर होता है | मजबूती के गुण मंगल ग्रह के समान है | 


    खैर (खादिर) का पेड़  9 से 12 मी तक ऊँचा होता है। यह कांटेदार होता है और इसकी उम्र लम्बी होती है। इसकी गांठें बाहर से गहरे मटमैले भूरे रंग की तथा अन्दर से भूरे और लाल रंग की होती हैं | कुछ पुराने पेड़ों के तने के अन्दर की दरारों में रवा या चूर्ण  रूप में कभी काले तो कभी सफ़ेद पदार्थ पाए जाते हैं। इसे खैर (खादिर)- सार कहते हैं |


   अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग स्थानों पर खैर के आयुर्वेदिक गुणों का वर्णन किया है। भावप्रकाश-निघण्टु में खैर, कदर तथा विट्-खदिर के नाम से इसकी तीन प्रजातियों का वर्णन मिलता है। राजनिघण्टु में तो इन तीन के अतिरिक्त, सोमवल्क व ताम्रंटक नाम से दो अन्य, अर्थात कुल पाँच प्रजातियों का उल्लेख मिलता है।


अनेक भाषाओं में खैर (खादिर) के नाम 



  • Hindi (acacia catechu in hindi) – खैर, कत्था, खैरबबूल

  • English – Black Catechu (ब्लैक कैटेचू), कैटेचु (Catechu), कच ट्री (Cutch tree),

  • Sanskrit – खदिर, रक्तसार, गायत्री, दन्तधावन, कण्टकी, बालपत्र, बहुशल्य, यज्ञिय, कदर

  • Urdu – खैर (खादिर) (Khair), काठो (Katho)

  • Assamese – खेर (Kher), कट (Kat)

  • Oriya – खोदिरो (Khodiro), खोईरो (Khoiro)

  • Kannada – काचू (Kaachu)

  • Gujarati – खेर (Kher), काथो (Katho)

  • Telugu (acacia catechu in telugu) – करगालि (Kargali), खदिरमु (Khadiramu)

  • Tamil (khadira in tamil) – कदिरम (Kadiram), कोदम (Kodam)

  • Bengali – खयेर गाछ (Khayer gaccha), कुथ (Kuth)

  • Nepali – खयर (Khayar)

  • Marathi – कदेरी (Kaderi), खैर (खादिर) (Khair), लालखैर (खादिर)(Lalkhair)  

  • Malayalam– कमरंगम (Kamrangam), पुलिन्जी (Pulingi)  

  • Arabic – काड हिन्दी (Kad Hindi)

  • Persian – मस्क दाना (Musk dana)


खैर वृक्ष(khadira tree) गर्म प्रदेशों में मिलता है। यह समस्त भारत के गर्म क्षेत्रों में तथा बाग-बगीचों में मिलता है। यह उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र तथा उड़ीसा के मैदानी एवं पहाड़ी क्षेत्रों में 1200 मीटर की ऊँचाई तक पाया जाता है।


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बुधवार, 28 अगस्त 2019

कनकधारा स्तोत्र एक अचूक उपाय, एक बार अवश्य आजमाएं

Image result for माठ लकॠषॠमी कनक धाराकनकधारा मंत्र साधना.
       ब्रम्हाण्ड का नियन्त्रण करने वाले पुरूष-तत्व प्रतिरूपों अर्थात त्रिदेवों में विष्णु को पालनकर्ता कहा जाता है. उन्हीं जगत-पालक विष्णु की शक्ति को लक्ष्मी की संज्ञा दी गई है.  विष्णु-पत्नी के रूप में लक्ष्मी उनके साथ सर्वत्र पूजित हैं. कहीं भी चित्रों में अथवा मूत्तियों में देखें तो हमें लक्ष्मी-विष्णु अथवा लक्ष्मी-नारायण की युगल छवि दिखाई देगी। सही भी है कि जो देवता पालन करते हैं, उसकी शक्ति (पत्नी) अवश्य ही भौतिक वस्तुओं की समृद्धि से सम्पन्न होगी. मानव-जाति के पालन-पोषण में जो कुछ भी अन्न, वस्त्र, धन आदि प्रयुक्त होते हैं। इस प्रसंग में यह भी स्मरण रखना चाहिए कि तीनों देवता (ब्रम्हा, विष्णु, महेश) उस व्यक्ति (साधक) पर विशेष कृपालु होते हैं, जो उन्हें उनकी शक्तियों (सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी) के साथ स्मरण करता है. वैसे, किसी भी देवी की साधना करके उसके देवता की, और किसी भी देवता की साधना करके उसकी देवी की कृपा भी प्राप्त की जा सकती है, तथापि सरलतम और संगत विधान यही माना जाता है कि अभीष्ट देवी-देवताओं की युगल रूप में आराधना करनी चाहिए। इसका प्रभाव विशेष रूप से अधिक और अनुकूल पाया जाता है. अत: लक्ष्मी उपासकों के लिए लक्ष्मी के साथ विष्णु का स्तवन-पूजन विशेष लाभकर माना जाता है.


Image result for माठ लकॠषॠमी कनक धाराशास्त्रों में उल्लेख है कि लक्ष्मी किन-किन स्थानों पर निवास करती है.



  1. जो व्यक्ति महाशक्ति माहेश्वरी के सबसे प्रिय शास्त्र देवीभागवत् का पाठ विधिवत नियमित रूप से करें या विद्वानों के द्वारा करायें एवं श्रवण करें उसके घर में लक्ष्मी सदैव निवास करती है. 

  2. जो व्यक्ति मधुर बोलने वाला, अपने कार्य में तत्पर, क्रोधहीन, ईश्वर भक्त, अहसान मानने वाला, इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखने वाला तथा उदार हो उसके यहां लक्ष्मी निवास करती है।

  3. जो व्यक्ति अपने घर में कमलगट्टे की माला, एकाक्षी नारियल, श्वेतार्क गणपति, दक्षिणावर्ती शंख, पारद शिवलिंग व श्रीयंत्र की स्थापना किसी विद्वान आचार्य के द्वारा अभिमंत्रित एवं विधिवत पूजा के अनुसार करवाता है उसके घर में अचल लक्ष्मी सदैव निवास करती है. सदाचारी, धर्मज्ञ, अपने माता-पिता की भक्ति भावना से सेवा करने वाले, नित्य पुण्य प्राप्त करने वाले, बुद्धिमान, दयावान तथा गुरू की सेवा करने वाले व्यक्तियों के घर में अवश्य ही लक्ष्मी निवास करती है.
    जिस व्यक्ति के घर में यज्ञ, अनुष्ठान, देवजप, महाशक्ति माहेश्वरी की पूजा व सुबह-शाम की आरती नियमित रूप से होती है, उसके घर में लक्ष्मी सदैव निवास करती है.

  4. जो स्त्री नियमित रूप से गाय की पूजा करती हो अथवा गोग्रास निकालती हो उस पर लक्ष्मी की विशेष दया रहती है.

  5. जिसके घर में पशु-पक्षी निवास करते हों, जिसकी पत्नी सुन्दर हो, जिसके घर में कलह नहीं होती हो, उसके घर में निश्चय ही लक्ष्मी रहती है.

  6. जिसके घर में मन्त्र सिद्ध श्रीयंत्र, कनकधारा यंत्र, कुबेर यंत्र स्थापित हों, उनके घर में लक्ष्मी पीढि़यों तक निवास करती है.

  7. जो अनाज का सम्मान करते हैं और घर में आये हुये अतिथि का, घर वालों के समान ही स्वागत सत्कार करते हैं उसके घर में लक्ष्मी स्थिर रूप से रहती हैं.
    जो व्यक्ति असत्य भाषण नहीं करता, अपने विचारों में डूबा नहीं रहता, जिसके जीवन में घमण्ड नहीं है,
    जो दूसरों के प्रति प्रेम प्रदर्शित करता है, जो दूसरों के दु:ख में दु:खी होकर उसकी सहायता करता है और जो दूसरों के कष्ट को दूर करने में आनन्द अनुभव करता है उसके घर में अवश्य ही लक्ष्मी निवास करती है.
    जो नित्य स्त्रान करता है, सुरूचि पूर्ण स्वच्छ वस्त्र धारण करता है, शीघ्र भोजन करता है, बिना सूंघे पुष्प देवताओं पर चढ़ाता है, जो दूसरी स्त्रयों पर कुदृष्टि नहीं रखता, उसके घर में लक्ष्मी रहती है.

  8. जो यथा सम्भव दान देता है शुद्ध और पवित्र बना रहता है, गरीबों की सहायता करता है, उसके घर में अवश्य ही लक्ष्मी निवास करती है। आंवले के वृक्ष के फल में, गाय के गोबर में, शंख में, कमल में और श्वेत वस्त्र में लक्ष्मी सदैव रहती है.

  9. जिसके घर में नित्य उत्सव होता है, जो भगवान शिव की पूजा करता है, जो घर में देवताओं के सामने धूप व दीपक जलाता है, जो अपने गुरू को ईश्वर के समान समझकर पूजा करता है उसके घर में लक्ष्मी निवास करती है.

  10. जो स्त्री पति का सम्मान करती है, पति की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करती, घर में सबको भोजन कराकर, फिर भोजन करती है। उसी स्त्री के घर में सदैव लक्ष्मी का निवास रहता है। प्रसन्न चित्त, मधुर बोलने वाली, सौभाग्यशालिनी, रूपवती सुन्दर और सुरूचिपूर्ण वस्त्र धारण किये रहने वाली, प्रियदर्शना और पतिव्रता स्त्री के घर में लक्ष्मी का निवास रहता है.

  11. जो स्त्री सुन्दर, हिरनी के समान नेत्र वाली, सुन्दर केश श्रृंगार करने वाली, धीरे चलने वाली और सुशील हो, उसके घर में लक्ष्मी निवास करती है.

  12. जिस पुरूष के दोनों पैर शुद्ध व चिकने होते हैं, जो अत्यल्प भोजन करता है, जो पवित्र पर्व के दिनों में मैथुन परित्याग करता है, उसके घर में निश्चित रूप से लक्ष्मी निवास करती है।

  13. जो व्यक्ति अपवित्र नहीं रहता, मैले वस्त्र धारण नहीं करता है, शरीर को दुर्गन्धयुक्त नहीं बनाता, चित्त में चिन्ता या दुख नहीं रखता, उसके घर में नित्य ही लक्ष्मी निवास करती है.

  14. जो व्यक्ति सूर्य उदय से पहले उठकर स्त्रान कर लेता है, जो सूर्यास्त से पहले स्त्रान कर पवित्र होता है.
    जो विरूद्ध आचरण नहीं करता, पराई स्त्री से संगम नहीं करता, दूसरों के धन में मन नहीं लगाता, किसी का अनिष्ट चिंतन नहीं करता वह लक्ष्मी का प्रिय बन जाता है.

  15. जो ब्रम्ह मुहूर्त मे उठकर स्त्रानादि कर संध्या करता है, दिन में उत्तर की ओर तथा रात्रि में दक्षिण की ओर मुंह करके मल-मूत्र त्याग करता है वह लक्ष्मीवान होता है.
    जो कुटिल आचरण नहीं करता, पुन: अकारण बार-बार स्त्रान नहीं करता, सत्य और मधुर वाणी का प्रयोग करता है। लक्ष्मी के सर्वथा निवास के लिए व्यक्ति को देवता, साधु, ब्राम्हण और गुरू में आस्था अवश्य रखनी चाहिए.

  16. जो संयमी स्थिरचित्त और मौन रहकर भोजन करता है उसके घर में अवश्य ही लक्ष्मी बनी रहती है.

  17. जो व्यक्ति गयाधाम में, कुरूक्षेत्र में, काशी में अथवा सागर संगम में स्त्रान करता है, वह निश्चय ही लक्ष्मी युक्त रहता है.

  18. जो व्यक्ति एकादशी तिथि को भगवान विष्णु को आँवला फल भेंट करता है, जल में आवंला डालकर स्त्रान करता है वह लक्ष्मी युक्त बना रहता है.


    Image result for माठ लकॠषॠमी कनक धारा      वेद, पुराण स्मृति एंव तंत्रशास्त्रों में अनेक विद्या मंत्रों का निर्देश हुआ है. कुछ मंत्रों का संकेत उत्तर काल के विद्वानों आचार्यो ने अपने अनुभव के आधार पर भी किया है. जिसमें से कुछ अति दुर्लभ मंत्रों का व्याख्यान अति व्यवहारिक भाषा में माता लक्ष्मी के भक्तों के लिए में बताने का प्रयास कर रहा हूँ-गुरू और शिष्य का एक मधुर और पवित्र सम्बन्ध होता है। गुरू के प्रति साधक की जैसी भावना होती है उसको वैसा ही फल प्राप्त होता है.


मंत्रे तीर्थे द्विजे जेवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ।
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।।


अर्थात तीर्थ, ब्राम्हण, देवता, ज्योतिषी, दवा तथा गुरू में जिस प्रकार की जिसकी भावना होती है, उसके अनुसार ही उसे सिद्धि प्राप्त होती है.


        कुछ मंत्र भी आर्थिक उन्नति के लिए अनुकूल है, परन्तु इस मंत्र में साधक को नित्य एक माला फेरनी आवश्यक है और मात्र ग्यारह दिन में ही यह मंत्र सिद्ध किया जा सकता है। शास्त्रीय ग्रंथों में इस मंत्र की विशेष प्रशंसा की गई है और कहा गया है कि लक्ष्मी जी के जितने भी मंत्र हैं उन सबमें इस मंत्र को श्रेष्ठ और अद्भुत तथा सफलतादायक बताया गया है। इस मंत्र का जप करने से पूर्व सामने थाली में चावल के ढेरी बनाकर उस पर कनकधारा यंत्र स्थापित करना चाहिए। यह यंत्र अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है और इस यंत्र से यह यंत्र ज्यादा संबंध रखता है, अत: इस यंत्र के सामने ही मंत्र का प्रयोग करने पर सफलता मिलती है।


    Image result for माठ लकॠषॠमी कनक धारा यह कनकधारा यंत्र धातु निर्मित मंत्रसिद्ध प्राण-प्रतिष्ठा युक्त होना चाहिए और अनुष्ठान करने से पूर्व ही इसे प्राप्त कर घर में स्थापित कर लेना चाहिए, स्थापित करने के लिए किसी विशेष विधि-विधान की आवश्यकता नहीं होती। प्रयोग समाप्त होने पर माला को नदी में प्रवाहित कर दें.


।।Image result for माठ लकॠषॠमी कनक धाराॐ श्रीं ह्वीं क्लीं श्रीं लक्ष्मीरागच्छागच्छ मम मन्दिरे तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा ।।


यह 22 अक्षरों का मंत्र लक्ष्मी का अत्यंत प्रिय मंत्र है और लक्ष्मी ने स्वयं ब्रम्हर्षि वशिष्ठ को यह बताया था और कहा था, कि यह मंत्र मुझे सभी दृष्टियों से प्रिय है और जो इस मंत्र का एक बार भी उच्चाारण कर लेता है, मैं उसके घर में स्थापित हो जाती हूँ.


धन-वैभव पाने का मंत्र
घर से दरिद्रता मिटाने और आर्थिक उन्नति के लिए इस मंत्र के मुकाबले में अन्य कोई मंत्र नहीं है।


लक्ष्मी स्तोत्र


त्रैलोक्यपूजिते देवि कमले विष्णुवल्लभे।
यथा त्वमचला कृष्णे तथा भव मयि स्थिरा।।
कमला चंचला लक्ष्मीश्चला भूतिर्हरिप्रिया।
पद्मा पद्मालया सम्यगुच्चौ: श्री पद्मधारिणी।।
द्वादशैतानि नाममि लक्ष्मी संपूज्य य: पठेत्।
स्थिरा लक्ष्मीर्भवेत्तस्य पुत्रदारादिभि: सह।।


इस मंत्र का केवल एक जप ही पर्याप्त होता है, दीपावली की रात्रि को यदि दक्षिणावर्ती शंख के सामने इस स्तोत्र का 101 बार जप कर दिया जाय तो उसकी मनोवांछित कामना अवश्य ही पूरी हो जाती है. इस शंख में जल भर कर स्तोत्र का मात्र 11 बार जप कर उस जल को घर में छि़डकने पर घर में शांति और समृद्धि प्राप्त होती है. यदि दक्षिणावर्ती शंख पर इस स्तोत्र का नित्य 21 बार जप तथा यह प्रयोग 11 दिन तक करें तो व्यापार में विशेष अनुकूता प्राप्त होती है तथा उसे मनोवांछित फल प्राप्त होता है। यदि पांच दिन तक नित्य शंख में जल भर कर इस स्तोत्र के 11 पाठ करके उस जल को दुकान के दरवाजे के आगे छि़डक दिया जाये तो उस दुकान की बिक्री बढ़ जाती है.


प्रयोग समाप्त पर शंख को तिजोरी में स्थापित कर देना चाहिए। इस प्रयोग को प्रत्येक गृहस्थ व्यक्ति को अपनाना चाहिए. दीपावली की रात्रि में लाल वस्त्र धारण कर लाल रंग के ऊनी आसन पर दक्षिण मुख होकर बैठें, सामने लाल वस्त्र पर तांबे के पात्र में तांत्रोक्त ढंग से चैतन्य की गई बिल्ली की नाल (जेर) को पूरी तरह से तेल मिश्रित सिंदूर में रख दें तथा मूंगे की माला से मंत्र का ग्यारह माला मंत्र जप करें-


मंत्र - ।।ॐ ह्रीं ह्रीं क्लीं नानोपलक्ष्मी श्रीं पद्मावती आगच्छ आगच्छ नम:।।


उपरोक्त मंत्र अत्यन्त तीव्र एवं पूर्णत: तांत्रोक्त मंत्र है और इतना अधिक तीव्र है कि प्राय: साधक को सुबह होते-होते अपनी समस्या का हल मिल जाता है। साधक इस साधना में दृढ़ता पूर्वक और बिना किसी भय के साधना रत रह सकता है. मंत्र जप के उपरान्त रात्रि-शयन उसी स्थान पर करें और स्वप्न में अपने आकस्मिक संकट का कोई न कोई उपाय प्राप्त होता ही है। सम्पूर्ण पूजन काल में तेल का दीपक जलता रहे और वह सुबह तक प्रज्वलित रहे, इस बात का ध्यान रखें बिल्ली की नाल को किसी पात्र में बंद करके रखना है। भविष्य में जब-जब आकस्मिक धन की तीव्र आवश्यकता आ पडे़ तब-तब प्रयोग को दोहरायें. सफलता अवश्य आपके हाथ लगेगी.


लक्ष्मी आदि शक्ति का वह रूप है, जो संसार को भौतिक सुख प्रदान करती हैं अर्थात वैभव, विलास, सम्पन्नता, अर्थ, द्रव्य, रत्न तथा धातुओं की अधिष्ठात्री देवी को लक्ष्मी कहते हैं. इस देवी के व्यापक प्रभाव-क्षेत्र को देखकर ही कहा गया है लक्ष्मी के साथ लक्ष गुण रहते हैं.


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आज के युग में हर व्यक्ति अतिशीघ्र समृद्ध बनना चाहता हैं. धन प्राप्ति हेतु प्राण-प्रतिष्ठित कनकधारा यंत्र के सामने बैठकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से विशेष लाभ प्राप्त होता हैं. इस कनकधारा यंत्र कि पूजा अर्चना करने से ऋण और दरिद्रता से शीघ्र मुक्ति मिलती हैं। व्यापार में उन्नति होती हैं, बेरोजगार को रोजगार प्राप्ति होती हैं.


      श्री आदि शंकराचार्य द्वारा कनकधारा स्तोत्र कि रचना कुछ इस प्रकार कि हैं, जिसके श्रवण एवं पठन करने से आस-पास के वायुमंडल में विशेष अलौकिक दिव्य उर्जा उत्पन्न होती हैं। ठिक उसी प्रकार से कनकधारा यंत्र अत्यंत दुर्लभ यंत्रो में से एक यंत्र हैं जिसे मां लक्ष्मी कि प्राप्ति हेतु अचूक प्रभावा शाली माना गया हैं. 


       कनकधारा यंत्र को विद्वानो ने स्वयंसिद्ध तथा सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करने में समर्थ माना हैं. जगद्गुरु शंकराचार्य ने दरिद्र ब्राह्मण के घर कनकधारा स्तोत्र के पाठ से स्वर्ण वर्षा कराने का उल्लेख ग्रंथ शंकर दिग्विजय में मिलता हैं.


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।। ॐ वं श्रीं वं ऐं ह्रीं-श्रीं क्लीं कनक धारयै स्वाहा ।।


श्री कनकधारा स्तोत्र का रोज बुधवार से सवेरे एक पाठ करे तो समस्त प्रकार की आर्थिक बाधा 3-4 महीने मे समाप्त होता है।


श्री कनकधारा स्तोत्र:


ॐ अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम ।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।1।।


मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।2।।


विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि। ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।3।।


आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्। आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।4।।


बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति। कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।5।।


कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्। मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।।


प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन। मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।7।।


दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण। दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।8।।


इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते। दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।9।।


गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति। सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै ‍नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।


श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै। शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।11।।


नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै । नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।12।।


सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि। त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।13।।


यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:। संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।14।।


सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे। भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।15।।


दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम। प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।16।।


कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:। अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ।।17।।


स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्। गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।।18।।


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मंगलवार, 27 अगस्त 2019

क्या आपकी जन्म कुंडली में है अंगारक योग ?  अशुभ अंगारक दोष से हो सकती है जेल !!

शुभ अंगारक योग दिलाता है संपत्ति !!
         क्‍या है अंगारक योग ?



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    जब कुंडली में राहु अथवा केतु में से किसी एक के साथ अथवा दृष्टि से मंगल ग्रह का संबंध बन जाए तो उस कुंडली में अंगारक योग का निर्माण होता है.
अंगारक योग की हिन्दू ज्योतिष में मान्यता के अनुसार यदि कुंडली के किसी भी भाव में मंगल का राहु अथवा केतु से स्थान अथवा दृष्टि से संबंध बन जाए तो ऐसी कुंडली में अंगारक योग का निर्माण हो जाता है,  जिसके प्रभाव से जातक आक्रामक, हिंसक तथा नकारात्मक छवि का हो जाता है.
    इस योग वाले जातकों के अपने भाईयों, मित्रों तथा अन्य रिश्तेदारों के साथ संबंध भी खराब हो जाते हैं.  कुछ ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में अंगारक योग बन जाने पर  जातक अपराधी बन जाता है तथा उसे अपने गैर-कानूनी कार्यों के चलते लंबे समय तक कारावास में भी रहना पड़ सकता है.     


  किसी जातक को अंगारक योग के अशुभ फल तभी प्राप्त होते हैं जब कुंडली में अंगारक योग बनाने वाले मंगल, तथा राहु अथवा केतु दोनों ही अशुभ भाव 6,8, 12 में हों. यदि किसी कुंडली के तीसरे भाव में अशुभ मंगल का अशुभ राहु अथवा अशुभ केतु के साथ युति व दृष्टि सम्बन्ध हो जाए तो  ऐसी कुंडली में निश्चय ही अशुभ फल प्रदान करने वाले अंगारक योग का निर्माण हो जाता है जिसके चलते इस योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक आक्रामक तथा क्रोधी स्वभाव के होते हैं. तथा कुंडली में कुछ अन्य पाप ग्रहों के अशुभ प्रभाव होने पर ऐसे जातक भयंकर अपराधी, पेशेवर हत्यारे तथा आतंकवादी आदि भी बन सकते हैं.
     इसके अतिरिक्त यदि कुंडली में मंगल तथा राहु - केतु में से किसी के केंद्र व त्रिकोण में होने की स्थिति में जातक को अधिक अशुभ फल प्राप्त नहीं होते और अंगारक योग  के उपाय करने से संकट दूर हो जाता है.   
    किसी कुंडली के तीसरे भाव के साथ विशेष रूप से केंद्र व त्रिकोण में शुभ मंगल का शुभ राहु अथवा शुभ केतु के साथ संबंध हो जाने से कुंडली में बनने वाला अंगारक योग शुभ फलदायी होगा जिसके प्रभाव में आने वाले जातक उच्च पुलिस अधिकारी, सेना अधिकारी, कुशल योद्धा आदि बन सकते हैं, जो सम्मानजनक तरीके से अपनी सेवाकाल पूरा करते हैं.
   बहुत सी कुंडलियों के अध्ययन में पाया गया है कि अंगारक योग के प्रभाव में आने वाले विभिन्न जातकों को इस योग के शुभ अशुभ भिन्न भिन्न प्रकार के फल मिलते हैं जो मुख्य रूप से इन जातकों की कुंडलियों में अंगारक योग बनाने वाले मंगल तथा राहु अथवा केतु के स्वभाव, बल तथा स्थिति आदि पर निर्भर करते हैं.
    कुंडली में अशुभ मंगल तथा अशुभ राहु अथवा केतु के संयोग से बनने वाला अंगारक योग सबसे अधिक अशुभ फलदायी होता है जबकि इन दोनों ग्रहों में से किसी एक के शुभ हो जाने की स्थिति में यह योग उतना अधिक अशुभ फलदायी नहीं रह जाता. उदाहरण के लिए किसी कुंडली के छठे घर में अशुभ मंगल तथा शुभ राहु के स्थित हो जाने से बनने वाला अंगारक योग  जातक को क्रोधी नहीं बनाता तथा न ही किसी प्रकार के रोग से पीड़ित रहता है.
      इसी प्रकार कुछ नेताओं की कुंडली में शुभ मंगल तथा शुभ राहु अथवा केतु के संबंध से बनने वाला अंगारक योग उन्हें भ्रष्ट नेता न बनाकर शुभ फलदायी होता है, जिसके शुभ प्रभाव से जातक अपनी सेवा, निष्ठा व भागदौड़ से क्षेत्र व समाज में, सरकार में उचित स्थान प्राप्त करते हैं.
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      एक अन्य उदाहरण, यदि किसी की कुंडली में शुभ मंगल तथा अशुभ राहु के वृश्चिक राशि में स्थित होने से अंगारक योग का अशुभ प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहेगा क्योंकि वृश्चिक राशि में मंगल देव बलवान हो जाते हैं जबकि इस राशि में स्थित होने पर राहु का बल बहुत कम हो जाता है जिसके कारण ऐसा बलहीन राहु बलवान मंगल पर बहुत अधिक अशुभ प्रभाव नहीं डाल पाता.
    कुंडली में अंगारक योग के अशुभ फल तभी प्राप्त होते हैं जब इस योग का निर्माण करने वाले मंगल, राहु या केतु दोनों ही अशुभ स्थान में हों.  इसके अलावा यदि कुंडली में मंगल तथा राहु-केतु में से कोई भी शुभ स्थान में है तो जातक के जीवन पर अधिक नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता.  
अशुभ अंगारक योग के लक्षण     
अंगारक योग की पहचान जातक के आचरण से ही की जा सकती है.  इसकी बातचीत के तरीके से, रहन-सहन से इस योग के प्रभाव को परखा जाता है. 
⦁ जातक अत्यधिक क्रोध करने लगता है. 
⦁ वह अपना कोई भी निर्णय नहीं ले पाता हैं लेकिन जातक दुसरे पर हमेशा सन्देह करता है. 
⦁ स्वभाव से यह जातक अन्य को सहयोग देने में भ्रमित रहते हैं. 
⦁ इस योग के प्रभाव में जातक सरकारी संसाधनों का दुरपयोग करने से पीछे नहीं हटता है . 
⦁ अंगारक योग के कारण जातक का स्वभाव नकारात्मक हो जाता है.
⦁  इस योग के प्रभाव में जातक के अपने भाईयों, मित्रों तथा अन्य संबंधियों से व्यवहार बिगाड़ लेता है.
⦁ अंगारक योग होने से धन की कमी रहती है. 
⦁ इसके प्रभाव में जातक की छोटी-मोटी दुर्घटना में चोट लगती रहती है. 
⦁ वह विशेष रूप से पेट रोगों से ग्रस्त रहता है.
⦁ उसे लगता है कि उसके शत्रु उस पर तंत्र-मन्त्र या काले जादू का प्रयोग करते हैं. 
⦁ व्यापार और वैवाहिक जीवन पर भी अंगारक योग का बुरा प्रभाव पड़ता है.
⦁ अंगारक योग, में मुख्य रूप से सम्मिलित मंगल ग्रह अग्नि का, ऊर्जा का, कठोर अनुशासन का कारक है. कुंडली में इस योग के बनने पर जातक क्रोध से उत्पन्न विवाद में  और कई महत्वपूर्ण कार्यों में समय पर निर्णय न कर पाने के असमंजस में फंसा रहता है.
⦁ अशुभ अंगारक योग के कारण क्रोध, अग्निभय, दुर्घटना, रक्त से संबंधित रोग और स्किन की समस्याएं मुख्य रूप से होती हैं
      अंगारक योग शुभ और अशुभ दोनों तरह का फल देने वाला होता है. कुंडली में इस योग के बनने पर जातक अपने परिश्रम से नाम और पैसा जरूर कमाता है, परन्तु इस योग के प्रभाव में मंगल, राहू, केतु की दशा व अंतर में व्यक्ति के जीवन में कई बड़े उतार-चढ़ाव में बहुत कुछ खोता भी है.
क्या करें अगर कुंडली में राहु-मंगल हों साथ-साथ ?
Image result for अंगारक योगअंगारक योग के बुरे प्रभाव से बचने के सरल उपाय
इस योग के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए मंगलवार के दिन व्रत रखने से लाभ होगा.
⦁ इसके अलावा भगवान शिव के पुत्र कुमार कार्तिकेय की आराधना करें.
⦁ हनुमान जी की आराधना करने से ये दोनों ग्रह पीड़ामुक्त होते हैं, यह एक उत्तम उपाय है.
⦁ राहु के बीज मंत्र का उच्चारण करना लाभकारी होगा.
⦁ मंगल और राहु की शांति के लिए निर्दिष्ट दान करना लाभकारी होता है. 
⦁ आंवारा कुत्‍तों को मीठी रोटी खिलाएं.
⦁ घर पर राहु ग्रह की शांति हेतु पूजा रखें.
⦁ चंद्रमा के रोहिणी नक्षत्र में गोचर करने पर देवी लक्ष्‍मी की पूजा करें.
⦁ जातक को मेडिटेशन (ध्यान) से लाभ होगा. 
⦁ किसी भी प्रकार के वाद-विवाद से दूर रहें.
⦁ सत्‍संग का आयोजन करें और अपने गुरु को घर पर बुलाएं.
⦁ किसी धार्मिक स्‍थल जाकर भगवान की आराधना करें.
⦁ चांदी का पेंडेंट धारण करने से लाभ होगा.
⦁ रोज़ शाम को घर में घी का दीया जलाकर शांति पाठ करें.


     ऐसा माना जाता है कि कुंडली में यह योग होने पर इसकी शांति अवश्य ही करवाना चाहिए नहीं तो लंबे समय तक परेशानियां बनी रहती हैं. उज्जैन में अंगारेश्वर महादेव मन्दिर में मंगल-राहु अंगारक योग की शांति होती है.


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       क्या प्रभाव होता है कुंडली के बारह घरों में मंगल-राहु अंगारक योग का?
1- कुंडली के पहले घर में मंगल-राहु अंगारक योग होने से पेट के रोग और शरीर पर चोट का निशान देखने को मिलता है.
उपाय - रेवडिय़ां, बताशे पानी में बहाएं.
2- कुंडली के दूसरे भाव में अंगारक योग होने से धन संबंधित उतार चढ़ाव आते हैं.  ऐसे लोग धन के मामलों में जोखिम लेने से नहीं घबराते हैं.
उपाय - चांदी की अंगूठी बाएं हाथ की छोटी अंगुली ( बुध की अंगुली )  में पहनें.
3- जिन जातक की कुंडली के तीसरे भाव में ये योग होता उनको भाइयों और मित्रों से सहयोग मिलता है और वे मेहनत से पैसा, मान सम्मान कमाते हैं, किन्तु अशुभ प्रभाव होने से विपरीत फल मिलती है. सभी से अनबन हो जाती है.
उपाय - घर में चांदी की डिब्बी में हाथी दांत रखें.
4- कुंडली के चौथे भाव में ये योग होने से माता के सुख में कमी आती है और भूमि संबंधित विवाद चलते रहते हैं. 
उपाय- पञ्च धातु से बने नाग को घर दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखें और मंगलवार के दिन सोना, चांदी और तांबा तीनों को मिलाकर अंगूठी धारण करें. 
5- कुंडली के पांचवें भाव में अंगारक योग जातक को जुए, सट्टे, लॉटरी और शेयर बाजार में लाभ दिलाता है. परन्तु संतान पक्ष से कष्ट रहता है. 
उपाय- रात को सिरहाने मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर रखें और सुबह उठते ही पेड़-पौधों में डालें.
6- जिन जातक की कुंडली के  छठे घर में मंगल-राहु एक साथ होते हैं ऐसे लोग ऋण लेकर उन्नति करते हैं. यदि चंद्रमा भी पीड़ित हो तो अच्छे वकील और चिकित्सक भी इसी योग के कारण बनते हैं. परन्तु ऋण से मुक्ति में परेशानी होती है.
उपाय- कन्याओं को दूध पिलाए और उन्हें चांदी से बने आभूषण भेंट करें या उन्हें वस्त्र का दान दें.
7- कुंडली के सातवें भाव में अंगारक योग साझेदारी के काम में फायदा दिलाता है, परन्तु वैवाहिक जीवन में मन मुटाव पैदा करता है. 
उपाय - चांदी की ठोस गोली अपने पास रखें.
8- जिन जातक की कुंडली के  आठवें भाव में अंगारक योग बनता है, ऐसे जातकों को कुछ कठनाईयों के बाद वसीयत में सम्पत्ति मिलती है. परन्तु  ऐसे व्यक्तियों को अग्नि व शस्त्र से मृत्यु भय का खतरा होता है.
उपाय - मंगल व शनिवार को एक तरफ सिकी हुई मीठी रोटियां कुत्तों को डालें.
9- यदि कुंडली के भाग्य स्थान में ये योग बनता है तो ऐसे लोग कर्म से भाग्य उदय होता है, कभी- कभी बहुत प्रयास के बाद भी सुअवसर हाथ से निकल जाते है. ये लोग कुछ रूढ़ीवादी परम्परा व ठगी के शिकार भी हो जाते हैं.
उपाय- मंगलवार को हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाएं.
10- दसवें भाव में अंगारक योग जिन लोगों की कुंडली में होता है वो लोग रंक से राजा बन जाते हैं. परन्तु अपने उच्चस्थ अधिकारीयों का उचित सहयोग नही मिल पाता है. 
उपाय- मूंगा रत्न धारण करें. घर पर हनुमान जी का झंडा लगाएं.
11- कुंडली के लाभ भाव यानि ग्यारहवें भाव में अंगारक योग होने से प्रॉपर्टी से लाभ मिलता है, किन्तु शत्रु निरंतर परेशान करते हैं.
उपाय - मिट्टी के बर्तन में सिन्दूर रख कर, उसे घर के दक्षिण दिशा में भूमि के नीचे दबाए या लकड़ी के बक्से में रखे.
12- बारहवें भाव में अंगारक योग होता है उन लोगों का पैसा विदेश में जमा होता है. ऐसे लोग रिश्वत के मामले में बदनाम हो जाते हैं, कभी कभी लम्बे अभियोग व जेल यात्रा की भी सम्भावना हो जाती है.
उपाय- पलंग का त्याग करें, केवल भूमि पर ही सोए और रोज सुबह उठकर खाली पेट थोड़ा शहद खाएं.



जन्म कुण्डलिनी ना और अंगारक दोष के लक्षण जीवन में घट रहे हो तो विशेष रूप से ये उपाय करें,  जिनके करने से अंगारक योग के अशुभ प्रभाव से मुक्ति मिलती है 
1- अंगारक दोष की शांति हेतु मंगल देवता का पूजन करना चाहिये. या  देवी का उपासना से भी मंगल व केतु के दोषों को दूर किया जा सकता हैं.
2- शिवलिंग को नित्य दूध से स्नान करायें.
3- मोती धारण करना लाभदायक होता हैं. मूंगा धारण न करें.
4-  छोटें बच्चों को हमेशा प्रसन्न रखें. सफेद वस्तु कॉफी, किताब, चॉक्लेट, आदि बॉटे.
5-  ध्यान, योग तथा मंत्र जाप का प्रयोग करें.
6- तामसिक भोजन से दूर रहें. क्रोध व विवादों के निकट न जायें. किसी भी प्रक्रिया का तुरन्त प्रत्युत्तर न दें.
7- खेल-कूद, शारिरिक परिश्रम, ताकत वाले कार्य, सेना आदि से जुडना लाभदायक होता है.
8- अंगारक दोष के प्रभाव से बचने के लिये समय समय पर रक्त दान करते रहना चाहिये.
9- गरीबों को मंगलवार के दिन अनार बॉटें.
10- कनेर के पुष्पों को देवी का स्मरण कर जल में प्रवाहित करें.


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सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए सूर्याष्टकं के मन्त्रों के साथ इन 5 उपायों को करें


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नई दिल्ली | जिस जातक की कुंडली में सूर्य नीच राशि व शत्रु राशि में हैं अथवा शनि, राहू-केतु के दुष्प्रभाव में हैं, ऐसे जातक के जीवन में संबंधों व रोजगार को लेकर अस्थिरता बनी रहती है | जिनके जीवन में शत्रु बाधा, स्वास्थ्य व आर्थिक कष्ट लगातार बने हुए हैं, वे नित्य सुबह सूर्योदय से एक घंटा पूर्व उठकर स्नान करके प्रसन्न चित्त होकर पूर्ण आस्था से गायत्री मन्त्र को जपता हुआ सूर्य के सम्मुख खड़ा हो जाए और नीचे दिए हुए सुर्याष्टकं के प्रारम्भ के आठ मन्त्रों से सूर्य भगवान को अर्घ्य प्रदान करें तो वह निश्चित रूप से एक माह के भीतर वर्तमान समस्या से मुक्त हो जाता है | यदि समस्या या रोग पुराना हो तो समय लगेगा किन्तु शीघ्र ही लाभ मिलने लगेगा | धैर्य से सूर्य भगवान की भक्ति करते रहे तो कुंडली और गोचर के सभी पाप ग्रह अपना बुरा फल देना बंद कर देंगे | अकेले सूर्य ग्रह सभी ग्रहों से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं | ज्योतिष में सूर्य आत्मा का कारक ग्रह भी है |

    Image result for सूरॠय उपासनासूर्योपासना से आत्मबल बढ़ता है |
यहां प्रस्तुत है पवित्र सूर्याष्टक का पाठ।  पुराणों के अनुसार भी यह पाठ तुरंत फल प्रदान करने का सामर्थ्य रखता है |


           सूर्याष्टकम् 

आदिदेवं नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर ।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते ॥ १॥

सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् ।
श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ २॥

लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ३॥

त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्माविष्णुमहेश्वरम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ४॥

बृंहितं तेजःपुञ्जं च वायुमाकाशमेव च ।
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ५॥

बन्धूकपुष्पसङ्काशं हारकुण्डलभूषितम् ।
एकचक्रधरं देवं

 तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ६॥

तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजःप्रदीपनम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ७॥

तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ८॥

सूर्याष्टकं पठेन्नित्यं ग्रहपीडाप्रणाशनम् ।
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान्भवेत् ॥ ९॥

आमिशं मधुपानं च यः करोति रवेर्दिने ।
सप्तजन्म भवेद्रोगी प्रतिजन्म दरिद्रता ॥ १०॥

स्त्रीतैलमधुमांसानि यस्त्यजेत्तु रवेर्दिने ।
न व्याधिः शोकदारिद्र्यं सूर्यलोकं स गच्छति ॥ ११॥

इति श्री सूर्याष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥



 

यदि ये मन्त्र याद ना हो पाए तो सामने इन मन्त्रों को देखकर पाठ किया जा सकता है |  प्रात: स्नान करने के बाद ही सूर्यदेव को को जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद सूर्य से संबंधित वस्तुओं का दान, जप, होम  भी सूर्य के उपायों में आता है। सूर्य ग्रह की शांति करने के लिए इन ज्योतिषीय उपायों को अवश्य करना चाहिए |

 

1. स्नान द्वारा उपाय

 

    Image result for सूरॠय की वसॠतॠओं का दानजब जन्म कुंडली व दशा और गोचर में सूर्य पीड़ित हो तो जातक को सूर्योदय से पूर्व ही उठकर स्नान करते समय जल में खसखस या लाल फूल या केसर डालकर ही स्नान करना चाहिए |  खसखस, लाल फूल या केसर ये सभी वस्तुएं सूर्य की कारक वस्तुएं हैं तथा सूर्य के उपाय करने पर अन्य अनिष्टों से बचाव करने के साथ-साथ जातक में रोगों से लड़ने की शक्ति का विकास होता है | सूर्य की वस्तुओं से स्नान करने पर सूर्य की वस्तुओं के गुण व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करते हैं तथा उसके शरीर में सूर्य के गुणों में वृद्धि करते हैं |

 

     सूर्य के उपाय करने पर उसके पिता के स्वास्‍थ्य में सुधार की संभावनाओं को सहयोग प्राप्त होता है | 


 

2. सूर्य की वस्तुओं का दान

 

      Image result for सूरॠय की वसॠतॠओं का दानसूर्य ग्रह की शान्ति के लिए व उसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए जातक को सूर्य की वस्तुओं का दान करना बहुत जरुरी है | सूर्य की वस्तुओं का दान करने से ही सूर्य के अनिष्ट से बचा जा सकता है। सूर्य की दान देने वाली वस्तुओं में तांबा, गुड़, गेहूं, मसूर दाल दान की जा सकती है। यह दान प्रत्येक रविवार या हर माह सूर्य के राशि परिवर्तन जिसे सूर्य संक्रांति कहते हैं, के दिन किया जा सकता है | सूर्य पीड़ित जातक सूर्य ग्रहण के दिन सूर्य की वस्तुओं का दान करे तो सूर्य की विशेष कृपा प्राप्त होती है | 




     सूर्यदेव को प्रसन्न करने के इन उपाय के अंतर्गत सूर्य की सभी कारक वस्तुओं का एकसाथ भी दान किया जा सकता है |  दान करते समय वस्तुओं का वजन अपने सामर्थ्य के अनुसार लिया जा सकता है |  दान की जाने वाली वस्तुओं को व्यक्ति अपने संचित धन से दान करे तो ही शुभ परिणाम लाता है |  दान करते समय जातक में सूर्य भगवान पर पूरी श्रद्धा व विश्वास होना चाहिए | आस्था में कमी होने पर किसी भी उपाय के पूर्ण शुभ फल प्राप्त नहीं होते हैं |





 

 

3. सूर्य मंत्र का जाप

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    सूर्य के उपायों में मंत्र जाप भी किया जा सकता है | सूर्य के मंत्रों में 'ॐ घूणि: सूर्य आदित्य: मंत्र' का जाप किया जा सकता है |  इस मंत्र का जाप प्रतिदिन भी किया जा सकता है तथा प्रत्येक रविवार के दिन यह जाप करना विशेष रूप से शुभ फल देता है | प्रतिदिन जाप करने पर मंत्रों की संख्या 10, 20 या 108 हो सकती है | मंत्रों की संख्या को बढ़ाया भी जा सकता है  |


   मंत्र जाप की अ‍वधि में व्यक्ति को जाप करते समय सूर्य देव की ओर मुख करके ही सूर्य का मन में स्मरण व ध्यान करना चाहिए | 


 

4. सूर्य यंत्र की स्‍थापना

 

    ज्योतिषीय उपायों में यंत्र की स्थापना व पूजा का विशेष महत्व है | किसी योग्य सूर्य साधक द्वारा ही सूर्य यंत्र की स्‍थापना करने के लिए सबसे पहले तांबे के पत्र या भोजपत्र पर नक्षत्र विशेष में कागज पर ही सूर्य यंत्र का निर्माण कराया जाता है |  सूर्य यंत्र में समान आकार के 9 खाने बनाए जाते हैं। इनमें निर्धारित संख्याएं लिखी जाती हैं।

 

 

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      ऊपर के 3 खानों में 6, 1, 8 संख्याएं क्रमश: अलग-अलग खानों में होना चाहिए | मध्य के खानों में 7, 5, 3 संख्याएं लिखी जाती हैं तथा अंतिम लाइन के खानों में 2, 9, 4 लिखा जाता है |

    इस यंत्र की संख्याओं की यह विशेषता है कि इनका सम किसी ओर भी किया जाए उसका योगफल 15 ही आता है। संख्याओं को निश्चित खाने में ही लिखना चाहिए | 

 भोजपत्र या कागज पर इस यंत्र को लाल चंदन, केसर, कस्तूरी से बनाया जाता है | अनार की कलम से इस यंत्र के खाने बनाना उत्तम होता है |


 

5. सूर्य हवन कराना

   सूर्य गायत्री मंत्र से हवन में चावल की आहुतियाँ दें  |  


ॐ भास्कराय: विद्महे महातेजाय धीमहि । तन्नो सूर्य: प्रचोदयात् ॥




  Image result for सूरॠय गायतॠरीसूर्य कुंडली में आत्मा का प्रतिनिधित्व के साथ-साथ आरोग्य शक्ति व पिता के कारक के रूप में भी देखा जाता है |  जब जन्म कुंडली के अनुसार सूर्य के दुष्प्रभाव प्राप्त हो रहे हों या फिर सूर्य राहु-केतु से पीड़ित हों तो सूर्य से संबंधित उपाय करना लाभकारी रहता है |

 







शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

24 को जन्माष्टमी, 25 नंदोत्सव-पुराण निर्णय

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 नई दिल्ली : इस बार श्री कृष्ण  जन्माष्टमी दो बार मनाई जा रही है, किन्तु वैष्णव जन 24 अगस्त को मनाएंगे | 23 अगस्त को सप्तमी युक्त अष्टमी है, जिसे पुराणों में निषेध किया है | जन्माष्टमी को स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय के लोग अपने अनुसार अलग-अलग ढंग से मनाते हैं. श्रीमद्भागवत को प्रमाण मानकर स्मार्त संप्रदाय के मानने वाले चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अर्थात रोहिणी नक्षत्र में जन्माष्टमी मनाते हैं, जो 23 अगस्त को है तथा वैष्णव मानने वाले उदयकाल व्यापनी अष्टमी एवं उदयकाल रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी का त्यौहार मनाते हैं, जो कल शनिवार,  24 अगस्त को है |


वैष्णव और स्मार्त सम्प्रदाय मत


       वैष्णव और स्मार्त सम्प्रदाय मत को मानने वाले लोग इस त्यौहार को अलग-अलग नियमों से मनाते हैं। हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार वैष्णव वे लोग हैं, जिन्होंने वैष्णव संप्रदाय में बतलाए गए नियमों के अनुसार विधिवत दीक्षा ली है। ये लोग अधिकतर अपने गले में कण्ठी माला पहनते हैं और मस्तक पर विष्णुचरण का चिन्ह (टीका) लगाते हैं। इन वैष्णव लोगों के अलावा सभी लोगों को धर्मशास्त्र में स्मार्त कहा गया है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि - वे सभी लोग, जिन्होंने विधिपूर्वक वैष्णव संप्रदाय से दीक्षा नहीं ली है, स्मार्त कहलाते हैं।

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आईये जानते हैं कि पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के व्रत पर सही निर्णय कैसे किया जाता है | 


श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत निर्णय


"अग्नि पुराण" के अनुसार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के संबंध में इस प्रकार कहा गया है


वर्जनीय प्रयत्नेन सप्तमी संयुता अष्टमी। बिना ऋक्षेण कर्तव्या नवमी संयुता अष्टमी।


अर्थात: जिस दिन सूर्योदय में सप्तमी बेधित अष्टमी हो और रोहिणी नक्षत्र हो तो उस दिन व्रत नहीं रखना चाहिए। नवमी युक्त अष्टमी को ही व्रत रखना चाहिए।


 


पद्म पुराण


पद्म पुराण वर्णित है


पुत्रां हन्ति पशून हन्ति, हन्ति राष्ट्रम सराजकम। 
हन्ति जातान जातानश्च, सप्तमी षित अष्टमी।


अर्थात: अष्टमी यदि सप्तमी विद्धा हो और उसमें उपवास करें तो पुत्र , पशु, राज्य ,राष्ट्र , जात, अजात, सबको नष्ट कर देती है।।


स्कन्द पुराण


स्कन्द पुराण के अनुसार


पालवेधेपि विप्रेन्द्र सप्तम्यामष्टमी त्यजेत। 
सुरया बिंदुन स्पृष्टम गंगांभः कलशं यथा।


अर्थात: जिस प्रकार गंगा जल से भरा कलश एक बूंद मदिरा से दूषित हो जाता है उसी प्रकार लेश मात्र सप्तमी हो तो वह अष्टमी व्रत उपवास के लिए दूषित हो जाती है।


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    इन पौराणिक सन्देश को ध्यान में रखते हुए जन्माष्टमी व्रत एवं जन्मोत्सव 24 अगस्त 2019 शनिवार को ही मनाना चाहिए।



  • अष्‍टमी तिथि प्रारंभ: 23 अगस्‍त 2019 को सुबह 08 बजकर 08 मिनट से।

  • अष्‍टमी तिथि समाप्‍त: 24 अगस्‍त 2019 को सुबह 08 बजकर 30 मिनट तक।

  • रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ: 24 अगस्‍त 2019 की सुबह 04 बजकर 15 मिनट से।

  • रोहिणी नक्षत्र समाप्‍त: 25 अगस्‍त 2019 को सुबह 07 बजकर 58 मिनट तक।

  • व्रत का पारण: जानकारों के मुताबिक जन्‍माष्‍टमी के पहले दिन यानी 23 अगस्त को व्रत रखने वालों को अष्‍टमी तिथि 24 अगस्त प्रातः 8 बजकर 30 मिनट पर खत्म होने पर किया जाना चाहिये।

  • और जो भक्त लोग 24 अगस्त को व्रत रखेंगे उन्हें रोहिणी नक्षत्र के खत्‍म होने के बाद व्रत का पारण करना चाहिये



ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! जय श्रीकृष्ण 


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परमाणु युद्ध की धमकी देने वाले पाकिस्तानी मंत्री की लन्दन में पिटाई हुई,

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     लंदन में गुरुवार को पाकिस्तानी रेल मंत्री शेख रशीद की जमकर पिटाई हुई। लोगों ने उनको जमकर घूसे मारे और अंडे भी फेंके। पुलिस के आते ही हमलावर मौके से फरार हो गए। ज्ञात हो कि यह वही मंत्री हैं जिन्होंने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के भारत के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए परमाणु युद्ध तक की धमकी दे डाली थी। इसी मंत्री ने भारत-पाक के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस ट्रेन को बंद करने का एलान भी किया था। 

    Image result for पाकिसॠतानी रेल मंतॠरी शेख रशीद पिटाईअवामी मुस्लिम लीग के प्रमुख और पाकिस्तान के रेल मंत्री शेख रशीद पर उस समय हमला किया गया जब वह लंदन के एक होटल में आयोजित एक पुरस्कार समारोह में भाग लेकर होटल के लिए वापस निकल रहे थे। इस मामले में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है।

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने ली जिम्मेदारी


पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) की पीपुल्स यूथ ऑर्गनाइजेशन यूरोप के अध्यक्ष आसिफ अली खान और पार्टी की ग्रेटर लंदन महिला शाखा की अध्यक्ष समाह नाज ने ली है।


गुरुवार, 22 अगस्त 2019

मुस्लिम देश बाकू-अज़रबैजान में हैं दूसरा ज्वालाजी का हिन्दू मंदिर 

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    कैस्पियन समुद्र के निकट अजरबैजान देश में था ज्वालाजी का अद्भुत मंदिर. बाकू आतेशगाह या ज्वालाजी मंदिर अज़रबेजान की राजधानी बाकू के पास के सुराख़ानी शहर में स्थित एक मध्यकालीन हिन्दू धार्मिक स्थल है। मिडिल ईस्ट एशिया में कैस्पियन सागर के तट पर बसा हुआ एक देश है अजरबैजान (Azerbaijan), बाकू(Baku) इसकी राजधानी है। यह एक इस्लामिक राष्ट्र है और यहाँ की अधिक जनता मुस्लिम है।


   बाकू शहर अपनी तूफानी हवाओं के लिए भी प्रसिद्ध है यहाँ कभी-कभी तो हवायें इतनी तीव्र गति से चलती हैं कि इसमें मवेशी भेड़-बकरियाँ तक उड़ जाती हैं। यहाँ पर स्थित इस हिन्दू अग्नि मंदिर में एक पंचभुजा (पेंटागोन) अकार के अहाते के बीच में एक मंदिर है। इसी मंदिर के मंडप में निरंतर अग्नि जला करती थी. बाहरी दीवारों के साथ कमरे बने हुए हैं जिनमें कभी सौ से अधिक पुजारी जनों व उपासकों के रहने की व्यवस्था थी.


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मंदिर निर्माण की तिथि


हिन्दू धर्म अग्नि पूजा का विशेष महत्व है. बाकू ज्वाला जी मंदिर की दीवारों में जड़ा एक शिलालेख, जिसकी पहली पंक्ति 'श्री गणेसाय नमः' से शुरू होती है. इसपर विक्रम संवत १८०२ की तिथि है जो १७४५-४६ ईसवी के बराबर है . अरबियन आक्रमणकारियों द्वारा ध्वस्त इस धार्मिक स्थल को 18वीं शताब्दी के अंत में मुल्तान के हिन्दू व्यापारियों ने इसका जीर्णोद्धार किया.


Image result for जीवनजी जमशेदजी मोदीImage result for बाकू आतेशगाहडॉ सर जीवनजी जमशेदजी मोदी की यात्रा       


डॉ सर जीवनजी जमशेदजी मोदी ने अपनी पुस्तक 'माइ ट्रेवल्स आउटसाइड बॉम्बे-ईरान, अज़रबैजान,बाकू' में उन्होंने इस स्थल को पारसी धर्मस्थल की अपेक्षा हिन्दू मंदिर के प्रमाण के रूप में ही अनुभव किया.


Image result for लेनिन संगॠरहालय मासॠकोImage result for बाकू आतेशगाहमास्को के संग्रहालय में मिले प्रमाण      


18 सितम्बर 1925 को मोस्को की अपनी यात्रा में लेनिन संग्रहालय में एक मंडप में बाकू ज्वालाजी के अग्निकुंड के सामने आसन लगाए हुए एक ब्राह्मण की मूर्ति देखी, जो लकड़ियों से अग्नि जला कर पूजा कर रहा है. उस ब्राह्मण के माथे पर लाल तिलक लगा हुआ है. संग्राहलय के ही विवरण पट्टिका में स्पष्ट उल्लेख हुआ कि इस मंदिर का सम्बन्ध त्रितापों को हरने वाले शिव से है. 


Image result for बाकू आतेशगाह के दॠवाराImage result for बाकू आतेशगाह को संगॠरहालय बना दिया है अज़रबैजान सरकार ने 


हिन्दू शिलालेख       


      बाकू ज्वाला जी का निर्माण यूँ तो वैदिक काल से भी माना जाता है. यहाँ से प्राप्त एक शिलालेख में संस्कृत भाषा में लिखी हिन्दू देवता की स्तुति है, जिससे पता चलता है कि हिन्दू धर्म के अनुयायीयों के प्रभाव में यह स्थल रहा होगा.


   सुरखानी स्थित इस बाकू ज्वालाजी मंदिर के मुख्य द्वार के सामने ऊपर की ओर के एक शिलालेख जिसकी 9 पंक्तिया है. उनके ऊपर दो पंक्तियों में हिन्दू धार्मिक चिन्ह उत्कीर्ण हैं. प्रथम पंक्ति में दाएं से बायीं ओर एक पुष्प, एक घंटा, सूर्य, अग्नि का गोला, फिर अंत में एक पुष्प. दूसरी पंक्ति में क्रमशः पुष्प, त्रिशूल, स्वस्तिक, पुनः त्रिशूल और अंत में पुनः एक पुष्प बना हुआ है. मुख्य द्वार पर हिन्दू प्रतीकों के होने से इसके एक प्राचीन वैदिक मंदिर होने का प्रमाण मिलता है. इन शिलालेख में श्री गणेशाय नमः व श्री ज्वालाजी का उल्लेख होने से यह हिन्दू मंदिर के दावे को और मजबूत करता है. 
   


Image result for बाकू आतेशगाह को संगॠरहालय बना दिया है अज़रबैजान सरकार ने Image result for बाकू आतेशगाह को संगॠरहालय बना दिया है अज़रबैजान सरकार ने संग्रहालय बना दिया है अज़रबैजान सरकार ने 


अज़रबैजान सरकार ने अब इसे एक संग्राहलय बना दिया गया और अब इसे देखने हर वर्ष १५,००० सैलानी आते हैं। २००७ में अज़रबेजान के राष्ट्रपति के आदेश से इसे एक राष्ट्रीय ऐतिहासिक-वास्तुशिल्पीय आरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया. 


 भारतीय निवासी और तीर्थयात्री
    मध्यकाल के अंत में पूरे मध्य एशिया में भारतीय समुदाय फैले हुए थे | बाकू में पंजाब के मुल्तान क्षेत्र के लोग, आर्मेनियाई लोगों के साथ-साथ, व्यापार पर हावी थे | कैस्पियन सागर पर चलने वाले समुद्री जहाज़ों पर लकड़ी का काम भी भारतीय कारीगर ही किया करते थे |
     बहुत से इतिहासकारों की सोच है कि बाकू के इसी भारतीय समुदाय के लोगों ने आतेशगाह को बनवाया होगा या किसी पुराने ढाँचे कि मरम्मत कर के इसे मंदिर बना लिया होगा |


    जैसे-जैसे यूरोपीय विद्वान मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में आने लगे, उन्हें अक्सर इस मंदिर पर और उत्तर भारत और बाकू के बीच सफ़र करते हिन्दू भक्त मिल जाया करते थे |


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Image result for बाकू आतेशगाह के दॠवाराImage result for बाकू आतेशगाह के दॠवाराप्राचीन परम्परा है सात छिद्रों की जलती ज्वालाओं का पूजन 


ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार, १७वीं सदी के अंत में सुराख़ानी में भारतीय आतिशगाह बनने से पहले स्थानीय लोग भी इस 'सात छिद्रों की जलती ज्वालाओं' के स्थान पर पूजा किया करते थे" |


हिन्दू या पारसी मंदिर 


   अग्नि को हिन्द-ईरानी की हिन्दू वैदिक धर्म और पारसी धर्म की दोनों शाखाओं में पवित्र माना जाता है - हिन्दू लोग इसे 'अग्नि' कहते हैं और पारसी लोग इसके लिए 'आतर' सजातीय शब्द प्रयोग करते हैं | इस कारणवश विवाद रहा है कि आतेशगाह एक हिन्दू मंदिर है या पारसी आतिशकदा। मंदिर के ऊपर चढ़ा त्रिशूल वैसे तो हिन्दू धर्म कि निशानी होती है और पारसी विद्वानों ने इसकी जांच करके इसे एक हिन्दू स्थल बताया है, लेकिन एक अज़ेरी पेशकश के अनुसार यह संभवतः पारसी धर्म के तीन 'अच्छे विचार, अच्छे बोल, अच्छे कर्म' गुणों का प्रतीक भी हो सकता है |
     


जोनस हैनवे का मत 


    जोनस हैनवे (१७१२-१७८६) नामक एक १८वीं सदी के यूरोपीय समीक्षक ने पारसियों और हिन्दुओं को एक ही श्रेणी का बताते हुए कहा कि 'यह मत बहुत ही कम बदलाव के साथ प्राचीन भारतीयों और ईरानियों में, जिन्हें गेबेर या गौर कहते हैं, चले आ रहे हैं और वे अपने पूर्वजों के धर्म कि रक्षा में बहुत अग्रसर रहते हैं, विशेषकर अग्नि की मान्यता बनाए रखने में' |


 


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'गेबेर' बनाम गौड़ ब्राह्मण 


     'गेबेर' पारसियों के लिए एक फ़ारसी शब्द है जबकि गौड़ हिन्दू ब्राह्मणों की एक जाति होती है | उसके बाद आने वाले एक विख्यात विद्वान, ए॰ वी॰ विलयम्ज़ जैकसन ने इन दोनों समुदायों को भिन्न बताते हुए आतेशगाह के अनुयायियों की वेशभूषा, तिलकों, शाकाहारी भोजन और गौ पूजन के वर्णन के बारे में कहा कि 'हैनवे जिन चीज़ों की बात कर रहे थे वे स्पष्ट रूप से भारतीय हैं, पारसी नहीं' | फिर भी उन्होंने कहा कि सम्भव है कि हिन्दू उपासकों के बड़े समुदाय के बीच हो सकता है कि इक्के-दुक्के 'असली गेबेर (यानि ज़र्थुष्टी या पारसी)' भी उपस्थित रहें हों |


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हिमाचल की ज्वाला देवी 


निष्कर्ष में मुस्लिम देश में इस अग्नि मंदिर के हिन्दू संस्कृति से जुड़े होने में कोई संदेह नहीं रहा | हिमाचल के ज्वाला देवी का मंदिर की तरह यह भी हिन्दुओं के लिए आस्था का केंद्र है |


वजन करने के लिए त्रिफला अवश्य आजमाएं

    यदि आपका वजन कम नहीं हो रहा तो त्रिफला आजमाएं। इससे आपकी बॉडी का एक्‍सट्रा फैट कम होता है और बहुत सारे स्वास्थ्य लाभ भी होते हैं |


Image result for पानी या गरॠम पानी के साथ तॠरिफलात्रिफला एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक रासायनिक फ़ार्मुला है जिसमें अमलकी (आंवला )), बिभीतक (बहेड़ा) और हरितकी (हरड़ ) के बीज निकाल कर (1 भाग हरड, 2 भाग बहेड़ा, 3 भाग आंवला) 1:2:3 मात्रा में लेकर बनाया जाता है |


     विशेष रूप से मोटापा अब महिलाओं की एक बड़ी समस्या बन चुका है | जो महिलाएं फिट हैं, वे अपने वजन बढ़ने नहीं देना चाहती और जो मोटी हैं, वे इसे घटाना चाहती हैं क्‍योंकि ज्‍यादा वजन कई हेल्‍थ संबंधी समस्याओं का कारण भी बनता है। लेकिन मोटापा कम करना बहुत कठिन काम है क्‍योंकि इसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है।


     महिलाएं वजन कम करने के लिए विभिन्न तरीकों को अपनाती हैं। वे आमतौर पर वर्कआउट करती हैं, डाइट प्‍लान बनाती हैं और यहां तक फास्टिंग का भी सहारा भी लेती हैं। हालांकि यह सारे उपाय मोटापा कम करने के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं। लेकिन कई ऐसे हर्ब्‍स भी हैं जिनकी हेल्प से आप बिना किसी दर्द के वजन कम कर सकती हैं। जी हां वजन कम करने के लिए सबसे अच्छे हर्ब्‍स में से एक त्रिफला है।


     त्रिफला से बॉडी डिटॉक्‍स होती है और पेट, छोटी आंत और बड़ी आंतों को हेल्‍दी रखने में मदद मिलती है। इसके अलावा, यह मेटाबॉलिज्म को भी बढ़ावा देता है जिससे वजन कम करने में मदद मिलती है।
के अनुसार, 'त्रिफला में मौजूद एंटी-बायोटिक और एंटी-सेप्टिक बॉडी में वात, पित्त और कफ का बैलेस बनाए रखता है। आयुर्वेद के अनुसार इन्‍हीं तीनों के बैलेस बिगड़ने से आप बीमार पड़ते हैं। अगर आप त्रिफला का रोजाना इस्‍तेमाल करते हैं तो आपकी बॉडी रोगमुक्‍त रहते है।'



Image result for पानी या गरॠम पानी के साथ तॠरिफलापानी या गर्म पानी के साथ त्रिफला
     पानी के एक ग्‍लास में त्रिफला पाउडर के दो चम्मच मिलाकर इसे रात भर के लिए छोड़ दें। इस पानी को सुबह खाली पेट पिएं, इससे आप तेजी से वजन कम कर सकती हैं। या गर्म पानी और त्रिफला भी वजन कम करने में मदद करता है। बेहतर परिणामों के लिए, एक ग्‍लास पानी में त्रिफला का एक बड़ा चम्मच मिलाएं और रात भर के लिए छोड़ दें। सुबह इसे उबाल लें। अब इसे कुछ समय के लिए ठंडा होने दें और इसे बेहतर परिणामों के लिए एक बार में पिएं।


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शहद, दालचीनी और त्रिफला पाउडर
     वजन कम करने के लिए, एक ग्‍लास पानी में त्रिफला पाउडर का एक बड़ा चम्मच और दालचीनी की थोड़ी मात्रा मिलाएं और इसे रात भर के लिए छोड़ दें। सुबह में, शहद का एक बड़ा चम्मच मिलाएं और इस पानी का सेवन करें।
त्रिफला वजन कम करने में आपकी मदद करता है। इसके अलावा इसकी सबसे अच्‍छी बात ये हैं कि वजन घटाने के लिए त्रिफला लेने से इसका कोई साइड इफेक्‍ट भी नहीं होता है। 


   संयमित आहार-विहार के साथ त्रिफला का सेवन करने वाले व्यक्तियों को हृदयरोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, नेत्ररोग, पेट के विकार, मोटापा आदि होने की संभावना नहीं होती |


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